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... तो सुभाष को लखनऊ में गिरफ्तार करने से डर गई अंग्रेजी हुकूमत

Fri, 22 Mar 2019 04:54 PM IST
Amulya Rastogi अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
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सुभाष चंद्र बोस
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आजादी की लड़ाई के दौरान लखनऊ बोस की बहादुरी का भी गवाह रह चुका है। बात उस समय की है जब सुभाष चंद्र बोस त्रिपुरी में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे चुके थे। अली सरदार जाफरी और उनके साथियों ने 12 अक्तूबर 1939 को लखनऊ में ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन का यूपी शाखा का कार्यक्रम तय किया।
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इन लोगों के बुलावे पर सुभाष चंद्र बोस लखनऊ आए। कार्यक्रम अमीनाबाद स्थित गंगा प्रसाद मेमोरियल हॉल में आयोजित था। उन्होंने काफी जोरदार भाषण दिया। उनका भाषण सुनने के लिए अमीनाबाद में खचाखच भीड़ थी। क्रांति आंदोलन : कुछ अधखुले पन्ने के एक प्रसंग से पता चलता है, ‘उन्होंने ओज भरे स्वरों में कहा, ‘आजादी मांगी नहीं जाती है और हम उसे हासिल करके रहेंगे।’

इस घोषणा को कुछ ही मिनटों में खुफिया अफसरों ने संयुक्त प्रांत के तत्कालीन चीफ सेक्रेटरी मिस्टर गिबन तक पहुंचा दिया। इस घोषणा ने अंग्रेजों को अंदर तक झकझोर दिया था। चीफ सेक्रेटरी ने तुरंत गृह सचिव को बुलाया और उनसे सलाह मशविरा करके सुभाष की गिरफ्तारी का फैसला किया। उस समय कानून था कि जो व्यक्ति विलायत में रह चुका है उसकी गिरफ्तारी केवल अंग्रेज या एंग्लो-इंडियन पुलिस अफसर ही कर सकते हैं।
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स्टॉकवेल चुपचाप अमीनाबाद चौकी लौट आए

सुभाष बाबू विदेश में रह चुके थे। इसलिए उन्होंने असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस एफआर स्टॉकवेल को आर्म्ड पुलिस के दस्ते सहित सुभाष की गिरफ्तारी के लिए अमीनाबाद रवाना कर दिया। स्टॉकवेल ने देखा कि लाखों की भीड़ सुभाष के साथ है और नारे लगा रही है।

स्टॉकवेल चुपचाप अमीनाबाद चौकी लौट आए। उन्होंने गृह सचिव को फोन किया, ‘बोस को गिरफ्तार करना उचित नहीं है। लाखों की भीड़ है।’ उधर से हुक्म हुआ, ‘लौट आओ। ऐसे मौके पर मिस्टर बोस को गिरफ्तार करके रियाया में बदअमनी नहीं फैलानी।’
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