दोनों के धन में कुछ अंतर था। बातचीत के दौरान रामनाथ जी की एक बात सुनकर माखनलाल जी ने कहा, ‘मदद लेना है तो दोष क्या देखना।’ चतुर्वेदी जी का इतना कहना था कि राजर्षि टंडन बिगड़ गए। बोले, ‘क्या कहा। हम अर्थ प्राप्ति के लिए कोई भी दोषपूर्ण काम करने को तैयार हैं? मुझे यह स्वीकार नहीं।
हिंदी का प्रतिष्ठित करना है, लेकिन दोषपूर्ण तरीके से सहायता लेकर नहीं।’ बड़ी मुश्किल से हम लोगों ने टंडन जी को शांत किया। चतुर्वेदी जी ने भी अपने शब्द वापस लिए और पोद्दार जी ने भी टंडन से आर्थिक सहयोग लेने का आग्रह किया। उन्होंने सहयोग के रूप में जो धन दिया उसे लेकर चले आए।