वह जब दुखी होते थे तो मुझे पत्र लिख देते थे। इस बारे में उन्होंने मुझे पत्र लिखा, ‘भारत सरकार की यह उतार-चढ़ाव वाली उपाधियां देना मुझे पसंद नहीं। मुझे ‘भारत रत्न’ और सुमित्रानंदन पंत को ‘पद्मभूषण।’ यह ठीक है कि उम्र में मैं बड़ा हूं। मैैने भी काम किए हैं।
पर, आगे चलकर लोग पुरुषोत्तम दास टंडन को भूल जाएंगे लेकिन पंत जी की कविताएं तो हमेशा अमर रहेंगी। उनकी कविताएं लोगों की जुबान पर जिंदा रहेंगी। उनका काम मुझसे ज्यादा स्थायी है। इसलिए सुमित्रानंदन पंत को ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए।’ ऐसे थे राजर्षि टंडन।