बीते 12 मई को ही शाम छह बजे मैंने योगेशजी को फोन किया था। पांच मिनट बाद उन्होंने कॉल बैक किया। जोशीली आवाज में वे बोले... अरे देव! तुम्हारा फोन आया था। उन्होंने बताया कि बेटा ऑस्ट्रेलिया में है और बहू मायके में। वे लॉकडाउन में अकेले हैं। आधे घंटे की बातचीत में उन्होंने पुराने साथियों को याद किया। योगेश जी ने कहा देव, इन दिनों पीठ में बहुत दर्द है। मुझे अफसोस रहेगा कि कोरोना संकट के चलते मैं अंतिम यात्रा में शामिल ना हो सका है। वे मेरी गजलों के प्रशंसक थे। 12 मई को मैंने चाहने वालों के लिए कोई संदेश पूछा तो उन्होंने शुभकामनाएं देते हुए कहा था... कहां तक ये मन को अंधेरे छलेंगे, उदासी भरे दिन कहीं तो ढलेंगे।
यादगार हैं वो दो घंटे
लखनऊ दूरदर्शन के सहायक निदेशक आत्म प्रकाश मिश्र दादा साहेब फाल्के और यशभारती समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजे जा चुके योगेशजी से मेरी मुलाकात 2015 में लखनऊ में हुई। दूरदर्शन में उनका विशेष साक्षात्कार लेते वक्त उन्होंने दो घंटे साथ बिताए। वे दो घंटे मेरे लिए यादगार हैं। इतना सरल व्यक्तित्व और लखनऊ के लिए अगाध स्नेह मैंने कम ही लोगों में देखा। उनका गीत जिंदगी कैसी है पहेली हाय, मेरा पसंदीदा है।
डीडी1 से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी आरडी सिंह का कहना है कि आनंद और रजनीगंधा जैसी फिल्मों के गाने लिख कर ऊंचाइयां छूने वाला हमारे जैसे लोगों के लिए गाने लिखने को तैयार हो जाए तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है। बात 1987 की है जब फिल्म मरीचिका बनाने की तैयारी मैंने की थी। उन्होंने गाने लिखे। लखनऊ से उनका जन्म का रिश्ता था। लाटूश रोड पर एक मंदिर के पास शर्मा चाट वाले के पास उनका घर हुआ करता था। अब है कि नहीं हम नहीं जानते। हमेशा याद रहेंगे।
यूपी का नाम सुनकर खुद मिलने आ गए
संगीतकार केवल कुमार ने अपनी मुलाकात का जिक्र करते हुए बताया कि वर्ष 1983 में मैं एक भोजपुरी फिल्म के सिलसिले में मुंबई में था। उन्हें पता चला कि प्रदेश का कोई कलाकार मुंबई आया है और फिल्म बन रही है तो वे मिलने चले आए। अपनी सरजमीं के प्रति उनका यह लगाव, उस शख्स को अलग पहचान देता था।
उनका जाना फिल्म जगत के लिए बड़ा नुकसान
हास्य कवि सर्वेश अस्थाना ने कहा कि योगेशजी ने लखनऊ का नाम हिंदी फिल्म जगत और गीत के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में रोशन किया। उनके गीत सुनकर आज भी मन झूम उठता है। उनका दुनिया से जाना लखनऊ और फिल्म जगत के लिए बड़ा नुकसान है।
पहली बार मुंबई में मिला था योगेश जी से
केजीएमयू के डॉ. सूर्यकांत का कहना है कि मैं योगेशजी से पहली बार 2004 में मुंबई में मिला था, तब मुझे नहीं पता था कि वे इतने बड़े गीतकार हैं। वे कई बार लखनऊ मेरे घर आए। 2012 के बाद मैंने ही उनका नाम तत्कालीन संस्कृति मंत्री अरुणा कोरी से मिलकर यशभारती के लिए भेजवाया। मंत्रीजी भी यह जानकर चकित हुईं कि योगेशजी लखनऊ के हैं। उन्होंने यश भारती के लिए सिफारिश कर दी और उन्हें 2015 में यशभारती मिला।