‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान, निकलकर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।’ कवि सुमित्रानंदन पंत की ये पंक्तियां संस्कार गुप्ता पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। महज 14 वर्ष की आयु में जब उन्होंने हिंदी में कविताएं लिखनी शुरू कीं तो कहीं न कहीं वे उस दर्द से उपजी थीं जो उन्हें उसी दुनिया से मिला था जहां जन्म लेना मानव का सौभाग्य समझा जाता है।
लेकिन संस्कार के साथ परिस्थितियां बेहद अलग थीं। वे जन्म से ही चल-फिर नहीं सकते थे। अपने साथ के बच्चों को दौड़ता देख वे मन ही मन दर्द से भर जाते थे और फिर एक दिन इसी दर्द ने कागज पर उतरकर जब मन की पीड़ा लिखी तो वो कविता हो गई। महज 20 वर्ष की उम्र में संस्कार गुप्ता का पहला काव्य संग्रह ‘किशोर कविताएं’ अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है।
संस्कार के पहले काव्य संग्रह मेें कुल 106 कविताएं हैं जिनमें से ज्यादातर किशोर मन की कई ऐसी परतों को खोलती नजर आती हैं जिसे उस उम्र के बच्चे किसी से साझा नहीं कर पाते। संस्कार बताते हैं कि जब वे ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने की कोशिश करते और बार-बार गिरते तो मन बहुत उदास हो जाता था। लोगों का तिरस्कार करने वाला रवैया उनकेकिशोर मन को भेदता गया जिसने उनकेभीतर एक ऐसी जगह बना ली थी जिसे बाहर निकालना बेहद जरूरी था। बस यहीं से हुई अपनी भावनाओं को कागज पर उतारने की शुरूआत।
प्रकृति और शृंगार हैं प्रिय विषय
इसी वर्ष कक्षा 12 की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले संस्कार बताते हैं कि उनकी ज्यादतार कविताएं प्रकृति पर लिखी गई हैं और शृंगार भी उनका प्रिय विषय है जिसे वे अपनी कविताओं में ढालते हैं। कुछ कविताएं राजनीति पर लिखी हैं। काव्य संग्रह ‘किशोर कविताएं’ केअलावा उनकी 100 अन्य कविताएं अभी प्रकाशित होनी बाकी हैं जो जल्द ही उनके दूसरे संग्रह का हिस्सा बनेंगी।
माता-पिता हैं चिकित्सक
संस्कार की मां डॉ. अलका गुप्ता लोहिया अस्पताल में चिकित्सक हैं तो उनकेपिता डॉ. राजेंद्र कुमार विदेश में कार्यरत हैं। संस्कार का मानना है कि समाज के उनकेप्रति असहज वर्ताव और कई बार मिली असंवेदनशीलता ने ही उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया।
सोशल मीडिया पर मिली प्रशंसा तो बढ़ा आत्मविश्वास
संस्कार का कहना है कि उनकी कई कविताओं को जब सोशल मीडिया पर सराहना मिली तो उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और उनमें शारीरिक अक्षमता की भावना पीछे छूटने लगी।
किशोर मन की बात कहते हैं संस्कार
संस्कार गुप्ता ने कहा कि जब वे पुस्तक मेलों में जाते थे तो वे अक्सर देखते थे कि किशोर वर्ग की पसंद ऐसी पुस्तकें होती थीं जो उनके मन की बात कहें। ऐसी पुस्तकों का अभाव था और इसीलिए किशोर मन की बात मैंने अपनी कविताओं में कहने की कोशिश की है। संस्कार केप्रिय लेखकों मेें रविन्द्र नाथ टैगोर, रामधारी सिंह दिनकर और महाश्वेता देवी शामिल हैं।
मूंगफली बेचने वाले के बेटे में फूटे कविता के अंकुर
शिवम
- फोटो : amar ujala
नरही इलाके में रहने वाले एक आर्थिक विपन्न परिवार के बेटे शिवम जायसवाल में कविता के अंकुर प्रस्फुटित हो रहे हैं। शिवम के पिता मूंगफली विक्रेता हैं। उनके ठेले पर मौसम केअनुसार कभी आम का पना होता है तो कभी मौसमी फल। इसी परिवार में कक्षा नौ का छात्र एक प्रतिभाशाली बच्चा 15 वर्षीय शिवम भी है।
खास बात ये है कि शिवम ने महज 13 साल की उम्र में ही अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा का लोहा मनवा दिया था। उसने जुगाड़ की चीजों से पेपर कटर मशीन, वाटर पंप और कूलर बनाकर बड़े बड़ों को हैरत में डाल दिया था। बेहद कम उम्र में ही प्रतिभा केधनी इस बच्चे ने काव्य लेखन केक्षेत्र में भी अपनी लेखनी का लोहा मनवाना शुरू कर दिया है। वह कविताएं लिखता है।
शिवम की कविता के अंश
विश्व में सबसे प्यारी भाषा
हम सबकी शान है हिंदी,
मातृभाषाओं में सबसे न्यारी
शुद्ध वाक्यों की खान है हिंदी।
‘जय हिंद’ ‘हे राम’ का नारा वीरों का
वीरों का, बलिदान है हिंदी,
हिंद देश केहम हैं नागरिक
हम सबका अभिमान है हिंदी।