लखनऊ। राजधानी के सरकारी संस्थानों में खुले ट्रॉमा सेंटर के नाम पर ड्रामा चल रहा है। केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर अपनी क्षमता से अधिक मरीजों का लोड झेल रहा है। वहीं, पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के कई वार्डों में बेड खाली पड़े हैं। न्यूरो सर्जरी वार्ड तक में बेड खाली हैं। दोनों बड़े सरकारी संस्थानों के बीच तालमेल की कमी है। इसका खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।
केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में मरीजों की इतनी भीड़ है कि 400 बेड हमेशा फुल रहते हैं। 100 से ज्यादा मरीज स्ट्रेचर पर पड़े-पड़े इलाज कराने के लिए मजबूर हैं। गंभीर मरीज घंटों इमरजेंसी में इंतजार करते हैं। तीमारदारों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन मरीजों की बढ़ती संख्या के मुकाबले कोई ठोस व्यवस्था नहीं कर पा रहा। डॉक्टर और स्टाफ लगातार दबाव में काम कर रहे हैं, लेकिन मरीजों को राहत नहीं मिल रही।
वहीं, पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में स्थिति बिल्कुल उलट है। यहां 156 बेड हैं। आर्थोपैडिक, न्यूरो सर्जरी समेत अन्य विभागों के वार्डों में करीब 20 प्रतिशत बेड खाली पड़े हैं। बेड की आस में मरीज पीजीआई के मुख्य परिसर की इमरजेंसी व एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के बीच दौड़ लगा रहे हैं। इसके बावजूद केजीएमयू से मरीजों को व्यवस्थित तरीके से रेफर करने या बेड समन्वय की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं बनाई गई है। नतीजतन मरीज बेहाल हैं। समय पर मुकम्मल इलाज नहीं मिल पा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि दोनों संस्थानों के बीच रियल टाइम बेड मैनेजमेंट और रेफरल सिस्टम लागू किया जाए तो गंभीर मरीजों को काफी राहत मिल सकती है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं कर रहे हैं।
Iट्रॉमा सेंटर में मरीजों का लोड बहुत अधिक है। फिर भी हर मरीज को इलाज मुहैया कराया जाता है। किसी भी मरीज को बिना इलाज लौटाया नहीं जाता है। I
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- डॉ. प्रेमराज, ट्रॉमा प्रभारी, केजीएमयू I
Iएपेक्स ट्रॉमा सेंटर में आने वाले सभी मरीजों को भर्ती कर इलाज मुहैया कराया जाता है। यहां अमूमन सभी बेड भरे रहते हैं। I
I- डॉ. हर्षवर्धन, एपेक्स ट्रॉमा सेंटर प्रभारी, पीजीआईI