डाॅ. शरद चंद्रा, गौरव चौधरी, अखिल शर्मा।
लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के हृदय रोग विशेषज्ञों ने बेहद जटिल स्थिति में दो बुजुर्गों के वॉल्व बिना सर्जरी प्रत्यारोपित करने में सफलता पाई है। यह ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वॉल्व इम्प्लांटेशन (टीएवीआई) प्रक्रिया प्रो. शरद चंद्रा, प्रो. गौरव चौधरी और प्रो. अखिल शर्मा के नेतृत्व में हुई।
प्रो. शरद ने बताया कि पहले बुजुर्ग की उम्र करीब 84 वर्ष थी। उन्हें वॉल्व की खराबी के साथ हार्ट कम पंप करने, डायबिटीज, हाइपरटेंशन, पेशाब में खून आने और दोनों फेफड़ों में पानी भरने की समस्या थी। इस स्थिति में सर्जरी करना संभव नहीं था। जांच में पता चला कि काफी मात्रा में कैल्शियम जमा होने से उनकी धमनियां और संकरी हो चुकी थीं। ऐसे में इंट्रावस्कुलर लीथोटि्रप्सी बैलून प्रक्रिया से कैल्शियम को तोड़कर धमनियों को चौड़ा किया गया। इसके बार कैथेटर के माध्यम से वॉल्व प्रत्यारोपित किया गया।
फेल हो गया था सर्जरी के बाद लगा वॉल्व
दूसरे मरीज की उम्र 75 वर्ष थी। उन्हें आठ साल पहले सर्जरी से वॉल्व लगाया गया था, जो फेल हो चुका था। हृदय की पंपिंग भी कम हो गई थी। टीम ने टीएवीआई तकनीक से वॉल्व प्रत्यारोपित किया। प्रक्रिया पूरी होने के 48 घंटे बाद ही उन्हें छुट्टी दे दी गई।
समझें, क्या है ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वॉल्व इम्प्लांटेशन
टीएवीआई एक न्यूनतम इनवेसिव प्रक्रिया है। इसमें नस में कैथेटर डालकर दिल तक पहुंचाकर वॉल्व बदला जाता है। उच्च या मध्यम जोखिम वाले रोगियों के लिए यह ओपन हार्ट सर्जरी का बेहतर और सुरक्षित विकल्प है।
कार्डियोलॉजी विभाग में ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वॉल्व इम्प्लांटेशन तकनीक की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी। इसके बाद से सभी संकाय सदस्य इस तकनीक से इलाज कर रहे हैं। बुजुर्गों के लिए यह तकनीक वरदान है।
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प्रो. ऋषि सेठी,
विभागाध्यक्ष लारी कार्डियोलॉजी-केजीएमयू