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विकास दुबे का आधा गैंग साफ, 21 नामजद में से 6 ढेर, तीन गिरफ्तार, बाकी की तलाश

Sat, 11 Jul 2020 11:39 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
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Kanpur encounter - फोटो : अमर उजाला
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आठ पुलिसकर्मियों की जान लेने के जिम्मेदार विकास दुबे से जुड़ा आधा गैंग साफ हो गया है। नामजद 21 अभियुक्तों में से 6 मुठभेड़ में मारे गए और तीन को गिरफ्तार कर लिया गया है। जबकि बाकी 12 की तलाश की जा रही है। अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था प्रशांत कुमार ने बताया कि विकास दुबे गैंग के सफाये के लिए अभियान जारी रहेगा। 
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बीती 3 जुलाई को सुबह हुए एनकाउंटर में अतुल दुबे और प्रेम प्रकाश मारे गए थे। 4 जुलाई को सर्च अभियान में विकास दुबे के घर से 6 तमंचे, दो किलो विस्फोटक, 25 कारतूस और 15 देसी बम बरामद किए गए थे। पांच जुलाई को दया शंकर अग्निहोत्री पुलिस मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया गया था। वहीं, 6 जुलाई को पुलिस ने सुरेश वर्मा, क्षमा और रेखा को गिरफ्तार किया गया था। 

इसी तरह 7 जुलाई को संजय दूबे, श्यामू वाजपेई और जहान यादव को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया गया। इसी दिन अमर की पत्नी खुशी और शांति देवी नाम की महिला को गिरफ्तार किया गया। इसके अतिरिक्त विकास दुबे के मददगार दो पुलिस कर्मियों सब इंस्पेक्टर विनय तिवारी और केके मिश्रा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। 
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विकास दुबे गैंग के बाकी इनामी अपराधियों की तलाश तेज हो गई है। इनमें छोटू शुक्ला, मोनू, शशिकांत पंडित, शिव तिवारी, विष्णु पाल, राम सिंह, रामू वाजपेई, गोपाल सैनी, वीरू दुबे, शिवम, बाल गोविंद और बउवन शुक्ला शामिल हैं। इसमें से कुछ पर 25 हजार और कुछ 50 हजार रुपये का इनाम घोषित है। अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था के मुताबिक इस घटना की जांच के दौरान 60 से 70 अन्य अभियुक्तों के नाम पर आए हैं। उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जा रही है।

पुलिस के गायब असलहों की तलाश जारी

प्रशांत कुमार ने बताया कि पुलिस के जो असलहे गायब थे, उनमें से 3 पिस्टल बरामद कर ली गई है और एके 47 व इंसास राइफल की तलाश की जा रही है। ये दोनों पुलिस के लंबी दूरी तक अचूक निशाने के लिए जानी जाती हैं। यूपी पुलिस ने तीन दिनों में चार एनकाउंटर किए गए।

इसमें 8 जुलाई को विकास दुबे का दाहिना हाथ अमर दुबे को हमीरपुर में मुठभेड़ में मार गिराया गया। 9 जुलाई को उसका एक और भरोसेमंद साथी प्रभात मिश्रा, जो कानपुर से फरीदाबाद उसके साथ था, उसे ट्रांजिट रिमांड पर लाते समय कानपुर में मुठभेड़ में मार गिराया। 9 जुलाई को ही विकास दुबे नाटकीय ढंग से उज्जैन में पकड़ा जाता है और वहां से लाते समय कानपुर में हुई मुठभेड़ में वह भी मारा जाता है।

पहले भी उठते रहे हैं मुठभेड़ों पर सवाल 
पुलिस की मुठभेड़ पर कोई पहली बार सवाल नहीं उठ रहे हैं। पहले भी कई मामलों में पुलिस को अपनी मुठभेड़ों को लेकर कठघरे में खड़ा होना पड़ा है। ऐसे ही कुछ मामलों में पुलिसकर्मियों को अदालत ने सजा भी सुनाई है। चाहे वह पीलीभीत में एक साथ 11 सिखों को मुठभेड़ के नाम पर मारे जाने का मामला हो, बरेली में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव को मारा जाना हो, झांसी या नोएडा में हुई मुठभेड़ें हों। कई मामले चर्चा में रहे और इनमें पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे। किसी मामले की सीबीआई जांच हुई तो किसी मामले में सीबी सीआईडी ने जांच की। ज्यादातर मामलों में पुलिस पर लगे आरोप सही पाए गए। 

पीड़ितों को दिलाया हर्जानाः मानवाधिकार आयोग ने इनमें से कई मामलों में पीड़ित परिजनों को हर्जाना भी दिलाया है। जिन पीड़ितों को आयोग ने हर्जाना दिलाया उनमें बदायूं के ब्रिजपाल शाक्य, बुलंदशहर के कुलदीप सिंह, मथुरा के सलीम, लखनऊ की कुरैशा बेगम, शमा परवीन व शहीन जहां आदि शामिल हैं। आयोग के निर्देश पर इन सभी को पांच-पांच लाख की राशि दी गई। 
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47 पुलिसकर्मियों को हुआ था आजीवन कारावासः पीलीभीत में तो पुलिस ने 1991 में एक साथ 11 सिखों को मुठभेड़ में मार दिया था। इस कांड को लेकर सियासी सरगर्मी बढ़ गई थी। विपखी दलों समेत स्थानीय लोगों के विरोध के बाद मामले की सीबीआई जांच बैठाई जा सकी थी। इस मामले में सीबीआई कोर्ट ने 47 पुलिसकर्मियों को दोषी माना था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा तक सुनाई थी।  

आईपीएस समेत नौ मिले थे दोषीः बरेली में 2007 में मुकुल गुप्ता नाम के युवक को मुठभेड़ में मारने का दावा किया था। सीबीआई जांच के आदेश हाईकोर्ट ने दिए थे। मामले की पैरवी कर रहे मुकुल के वृद्ध मां व पिता की कुछ वर्षों बाद 2015 में हत्या कर दी गई थी। इस मामले की जांच में एक आईपीएस समेत कुल नौ पुलिस कर्मी दोषी पाए गए।
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