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सरकार का साफ संदेश, जारी रहेगी अपराधियों के सफाये की नीति, सवालों के बावजूद साख बरकरार

Sat, 11 Jul 2020 11:22 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : amar ujala
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विधानसभा चुनाव के समय भाजपा नेताओं ने चुनावी सभाओं में सार्वजनिक रूप से एलान किया था कि उनकी सरकार बनी तो अपराधी या तो जेल में होंगे या फिर ऊपर। विकास दुबे और उनके साथियों की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो या बहराइच में इनामी अपराधी पन्ना यादव की। सरकार का संदेश साफ  है कि कोई राजनीतिक गठजोड़ नहीं चलेगा और सरकार की मुठभेड़ में अपराधियों के सफाई की नीति कायम रहेगी। भले ही कोई विकास की तरह ड्रामे अंदाज के समर्पण कर खुद को बचाने की कोशिश करे। 
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यह ठीक है कि विकास दुबे या उसके साथियों की एक के बाद एक  पुलिस मुठभेड़ में हुई मौतों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। तकनीकी  रूप से सवाल उठाने वालों के तर्कों को पूरी तरह खारिज भी न किया जा रहा हो। बावजूद इसके इस घटना से यह संदेश तो निकल ही रहा है कि अपराधियों से कोई नरमी न करने  का वादा करके सत्ता में आई भाजपा सरकार अपना संकल्प भूली नहीं है। 

तभी तो संभवत: पहली बार पुलिस ने आठ पुलिस कर्मियों को मारने वाले अपराधी विकास दुबे को भागने पर गोली मारने में तब भी हिचक नहीं दिखाई, जबकि गिरफ्तारी के समय मैं हूं  विकास दुबे कानपुर वाला, कहने वाले इस आरोपी ने खुद को ऐसी किसी घटना से बचाने की पेशबंदी करने की कोशिश की थी
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उसके बाद विकास दुबे की गिरफ्तारी पूरे देश में चर्चा बन गई, लेकिन योगी सरकार इसके बाद दबाव में नहीं दिखी। गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ ने यूपी की सत्ता संभालने के बाद ही कहा था कि अपराधी या अपराध छोड़ दें या अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहें या फिर प्रदेश ही छोड़ दें। 
 

सवाल तो तब उठे थे

दरअसल, तमाम सवालों के बावजूद कोई भी इस बात से शायद ही इनकार कर सके कि मौजूदा सरकार ने अपराधियों और अपराध पर कठोरता का संदेश साफ रखा है। नहीं तो यह वही पुलिस है जिसके दो दर्जन लोगों ने भाजपा के वरिष्ठ नेता और दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री संतोष शुक्ल की 2001 में थाने में घुसकर विकास दुबे द्वारा की गई हत्या के मामले में ठीक से गवाही तक नहीं दी थी। 

इसके चलते विकास न्यायालय से छूट गया था। संतोष शुक्ला की थाने में हत्या भले ही भाजपा सरकार में हुई थी, लेकिन फैसला गैर भाजपा सरकार में आया। सरकार ने इस मामले में ठीक से पैरवी न करने वाले पुलिस कर्मियों पर कोई कार्रवाई नहीं की थी। इसलिए विकास दुबे की पुलिस मुठभेड़ में मौत पर सवाल उठने के बावजूद कोई इससे तो इन्कार नहीं कर सकता कि वर्तमान प्रदेश सरकार में पुलिस का मनोबल बढ़ा है। 

साथ ही उसके काम करने की शैली भी बदली है । संतोष शुक्ल के मामले में विकास के दबाव व डर में ठीक से गवाही देने की हिम्मत न जुटा पाने वाली पुलिस अब उस जैसे अपराधियों से मोर्चा लेने लगी है तो कामकाज में आने वाले बदलाव को तो मानना ही पडे़गा । 

ये भी हैं नजीर
सिर्फ  विकास दुबे, अमर दुबे या प्रभात मिश्र ही क्यों शुक्रवार को ही बहराइच में गोरखपुर के 50 हजार के इनामी पन्ना यादव की पुलिस मुठभेड़ में मौत भी मौजूदा सरकार में पुलिस के रवैये में बदलाव का संदेश देती है। पश्चिम के मुकीम काला गैंग का सफाया भी सरकार के इरादों को ही साफ करता हैं। मुख्तार अंसारी गिरोह की दबंगई की खबरों पर विराम, कॉलेज में हंगामा करने वाले अतीक अहमद जैसे कुख्यात आपराधिक छवि वाले व्यक्ति के साथ कानून की सख्ती और जेल जैसे मामलों की फेहरिश्त भी तमाम सवालों के बावजूद सरकार के संदेश को तो साफ-साफ बताती ही है।
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सरकार की असली चुनौती बाकी

समाजशास्त्री डॉ. विनोद चंद्रा भी कहते हैं कि अपराधी और अपराधों के साथ किसी प्रकार की सहानुभूति नहीं हो सकती। विकास दुबे अपराधी  नहीं, बल्कि आतंकी था। उसके साथ यही होना था, लेकिन लोकतंत्र में अपराध और अपराधियों पर अंकुश के लिए व्यक्ति के बजाय व्यवस्था को  दुरुस्त करने की बड़ी चुनौती सरकार के सामने अब भी खड़ी है।

सरकार को अपराधियों से तात्कालिक तरीकों से निपटने के बजाय न्यायिक संस्थाओं में पैरवी को प्रभावी बनाकर उन्हें जल्द से जल्द कठोर सजा दिलाने की संस्कृति विकसित करनी चाहिए। जिससे अपराधियों को संरक्षण व सहयोग की प्रवृत्ति पर ही अंकुश लग जाए।

बदलाव को स्थायी बनाएं तो बने बात
विकास दुबे से जुड़े घटनाक्रम ने न सिर्फ राजनीतिक विकृतियों की तरफ ध्यान दिलाया है बल्कि सरकार के सामने अपराधियों के राजनीतिक और पुलिस तंत्र से गठजोड़ खत्म करने की तरफ भी ध्यान आकृष्ट किया है। थाने में संतोष शुक्ल मामले में गवाही से मुकरी पुलिस आज यदि विकास जैसों की जड़े खत्म करने का हौसला दिखाती है तो इसका श्रेय प्रदेश सरकार को देना ही होगा।

पर, विकास की पत्नी की एक राजनीतिक दल की सदस्यता की रसीद सामने आना और विकास दुबे के लिए अपने ही विभाग की मुखबिरी करने में दारोगा विनय तिवारी सहित अन्य कई पुलिस वालों का चेहरा बेनकाब होना, सरकार के सामने बड़ी चुनौती रखने वाला भी है। इन घटनाओं ने बता दिया है कि मौजूदा सरकार को अपराधियों से पहले विकास जैसों की राजनीतिक और पुलिस संरक्षण की विकृति पर प्रहार करना होगा। तभी ऐसी दुर्दांत घटनाएं थमेंगी।  -प्रो. एसके द्विवेदी, पूर्व विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
 
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