पिछले लोकसभा चुनाव में सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद अलग-अलग लड़े। लोकसभा की 80 में 73 सीटें भाजपा गठबंधन के पक्ष में चली गई। बसपा का खाता नहीं खुला और चौधरी अजित सिंह अपने ही घर बागपत में हार गए। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में इससे सबक लिया और सपा के साथ मिलकर लड़ी। पर, बसपा और रालोद अलग ही रहे। भाजपा फिर भारी पड़ी।
बसपा ने इससे सबक लेकर गोरखपुर और फूलपुर में उपचुनाव के मौके को अपनी ताकत का अहसास कराने का अवसर बनाया। उसने सपा के समर्थन की घोषणा कर रणनीतिक रूप से यह संदेश देने की कोशिश की कि वह विपक्षी एकता और भाजपा की राह रोकने के लिए पुरानी दुश्मनी भूलने को भी तैयार है। वैसे, इसके पीछे उसकी मंशा कहीं न कहीं विपक्ष को भी अपनी ताकत का अहसास कराने की दिखी। उसने दिखाया कि हमारे बिना भाजपा से मुकाबला मुश्किल होगा।
बसपा की रणनीति कामयाब रही। विपक्ष खासतौर से कांग्रेस तथा रालोद ने शायद उत्तर प्रदेश के इस राजनीतिक सच को समझा कि आज की परिस्थितियों में सपा और बसपा की ताकत को स्वीकार किए बिना न तो अस्तित्व बचेगा और न भाजपा से लड़ा जा सकेगा। शायद इसीलिए कैराना में सभी इस सच को आधार बनाकर ही आगे बढ़े।
बसपा ने भले ही कैराना पर अभी अपने पत्ते न खोले हों लेकिन यूपी की राजनीति में लंबे अर्से बाद कैराना उपचुनाव के रूप में भाजपा और संयुक्त विपक्ष के रूप में मुकाबला हो रहा है। यहां के नतीजों से साफ होगा कि संयुक्त विपक्ष और भाजपा में कौन ताकतवर है?
जाहिर है, 2019 में भाजपा बनाम विपक्षी दलों के बीच चुनावी समर की बिसात बहुत कुछ कैराना के नतीजों पर निर्भर होगी। रालोद जीता तो महागठबंधन की संभावनाएं मजबूत होंगी। भाजपा जीती तो ये संभावनाएं कमजोर हो जाएंगी।