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पढें 'पहलवान' मुलायम की कहानी, शिवपाल की जुबानी

Sat, 22 Nov 2014 03:50 PM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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1962 में नंगला गांव में अपने से ताकतवार पहलवान को नेताजी (मुलायम सिंह यादव) ने जिस चालाकी और फुर्ती से चित किया, उसे देखकर इटावा के समाजवादी नेता नत्थू सिंह बहुत प्रभावित हुए।
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नत्थू सिंह 1962 के चुनाव में इटावा जिले की जसवंतनगर विधानसभा सीट से सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी थे। नत्थू की शाबाशी के बाद नेताजी ने उनके चुनाव के लिए कड़ी मेहनत की। 1969 में उन्हीं नत्थू सिंह ने खुद प्रस्ताव करके जसवंतनगर से मुलायम को संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का उम्मीदवार बनाया।

उस समय मेरी उम्र लगभग 14 साल थी। नेताजी ने राजनीति के खिलाड़ी कहे जाने वाले लाखन सिंह यादव को हराकर मात्र 28 साल की उम्र में विधानसभा में प्रवेश किया। नेताजी एमएलए भले ही 1969 में बने, लेकिन नेतृत्व के गुण उनमें पहले से मौजूद थे।
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पढ़ाई के साथ वे वाद-विवाद प्रतियोगिताओं और कुश्ती के मुकाबलों में भाग लेते थे। 1962 में वे रिकॉर्ड मतों से केके महाविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। 1963 में एके कॉलेज शिकोहाबाद से बीटी परीक्षा पास करने के बाद नेताजी जैन इंटर कालेज में शिक्षक नियुक्त हो गए थे।

15 साल की उम्र में पहली गिरफ्तारी

नेताजी के स्कूली दिनों की बात है। एक जाटव किशोर सुक्खा को कुछ बड़े घर के बच्चे पीट रहे थे। उसने नेताजी को आवाज लगाई। नेताजी सुक्खा को पीट रहे लड़कों से भिड़ गए। बाद में अध्यापक सुजान ठाकुर ने बीच-बचाव कराया।

नेताजी की उम्र 15 साल रही होगी। प्रदेश की तत्कालीन गोविंद वल्लभ पंत सरकार ने 13 जिलों में नहर की आबपाशी बढ़ी दी। लोहिया ने इसके खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया। उस आंदोलन में नेताजी अपने साथियों के साथ गिरफ्तारी देने पहुंच गए थे।

इससे स्वतंत्रता सेनानी पंडित देवीदयाल दुबे काफी प्रभावित हुए। विधायक नत्थू सिंह के मना करने के बावजूद पंडितजी उन्हें अपने साथ जेल ले गए।
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जानलेवा हमले से भी नहीं डिगा हौसला

नेताजी जातिवाद के खिलाफ थे। छात्र जीवन में एक बार चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने पड़ोस के गांव में परिचित जाटव के यहां भोजन किया। इस पर पुरातनपंथी और रूढ़िवादी लोग पिताजी के पास पहुंचे। कुछ लोग जहां नेताजी के विरोध में थे, वहीं खुले मन के युवा और जातीय जड़ता के खिलाफ लड़ने वाले लोग नेताजी के पक्ष में खड़े हो गए। 40 दिन तक यह गतिरोध चला। नेताजी को पड़ोस के गांव में भजनलाल के यहां रहना पड़ा।

विरोध के बावजूद नेताजी ने आगे बढ़कर सैफई की परंपरागत होली में भी अनुसूचित जाति के लोगों को शामिल किया।

1982 में विधान परिषद सदस्य और फिर विधान परिषद में लोकदल का नेता चुने जाने के बाद नेताजी के बढ़ते प्रभाव से बौखलाए अराजक तत्वों ने उन पर जानलेवा हमला किया।

मार्च 1982 में महीखेड़ा गांव में शादी में जाते समय उन पर अपराधियों ने हमला किया। इसके बावजूद उनके हौसलों में कमी नहीं आई। 1989 के चुनाव के दौरान भी हैबरा के पास उन पर हथगोलों से हमला किया गया।
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