वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शर्मा भी कहते हैं कि प्रदेश प्रभारी संजय सिंह कोरोनाकाल के दौरान लगभग 10 महीने से प्रदेश में राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं। प्रदेश सरकार पर लगातार निशाना साधकर पार्टी को चर्चा में लाते रहे हैं। पर, ध्यान रखना होगा कि उत्तर प्रदेश दिल्ली नहीं है। यहां के लोगों का राजनीतिक मिजाज व समीकरण एकदम अलग हैं।
प्रदेश में ज्यादातर स्थानों पर चतुष्कोणीय मुकाबले का समीकरण है। ऐसे में पांचवीं पार्टी के रूप में आप का आकर सवा साल में दिल्ली जैसा करिश्मा कर देना संभव नहीं लगता। सिवाय विपक्ष के वोटों में कटौती करने के। दिल्ली में आप के सामने मुख्य रूप से भाजपा व कांग्रेस ही थी। पर, यूपी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दल भी हैं, जिनका अपना-अपना 19 से 24 प्रतिशत तक वोट बैंक है।
ऊपर से दिल्ली के विधानसभा से ज्यादा सदस्य प्रदेश के कई नगर निगमों में चुने जाते हैं। फिर अभी हाल में हुए उपचुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि प्रदेश की योगी सरकार को लेकर जनता के बीच कोई सत्ताविरोधी रुझान नहीं है। इसलिए भी आप का यूपी में फिलहाल करिश्मा करना आसान नहीं दिखता।
पिछले दिनों प्रदेश प्रभारी और राज्यसभा सदस्य संजय सिंह की उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में सभी पदों पर उम्मीदवार उतारने और अब केजरीवाल की 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी खड़े करने की घोषणा की बिल्कुल अनदेखी नहीं की जा सकती।
- पंचायत चुनाव के जरिये आप ने गांव-गांव अपनी पहुंच बनाने की तैयारी की है। भाजपा इसे समझ रही है और इसीलिए उसने केजरीवाल पर पलटवार करने में देरी नहीं लगाई। सेवानिवृत्त प्रोफेसर एपी तिवारी अपने कुछ मेधावी छात्रों के अचानक आप के समर्थन में सोशल मीडिया पर सक्रियता बढ़ने का उल्लेख करते हुए कहते हैं, यह सही है कि जहां-तहां युवाओं के मन के किसी कोने में आप का आकर्षण दिख रहा है लेकिन भाजपा जैसे काडर वाले राजनीतिक दल के सामने करिश्माई प्रदर्शन कर पाना बहुत दूर की कौड़ी है। कारण, आप का आकर्षण अभी समूह का रूप नहीं ले पा रहा है। साथ ही आप के लिए प्रदेश में इतनी जल्दी मजबूत संगठन खड़ा कर पाना भी आसान नहीं लगता। इसलिए केजरीवाल की संभावनाएं फिलहाल भाजपा विरोधी वोटों में ही दिख रही हैं।
सेंट्रल फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स, कानपुर के निदेशक डॉ. एके वर्मा का कहना है कि दिल्ली और उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने में काफी अंतर है। वैसे अरविंद केजरीवाल राजनेता हैं। आप राजनीतिक दल है। चुनाव कहीं से भी लड़ सकते हैं। उस पर कोई रोक नहीं लगा सकते। पर वह भूल जाते हैं कि उत्तर प्रदेश की हैसियत विश्व के पांचवें देश जैसी है। यहां चुनाव लड़ना हंसी-खेल नहीं है। न तो उनका अभी यहां गांव-गांव संगठन है और न जमीन व जनाधार। यहां की विधानसभाओं का भौगोलिक क्षेत्रफल काफी विशाल है। जिसके हर गांव में इतनी जल्दी आप का अपनी पकड़ व पहुंच बना पाना आसान नहीं है।