अनुपमा शांडिल्य, मुरादाबाद मंडल (करीब 10 साल), हेमंत सिंह, गोरखपुर (करीब 7 साल), भरत प्रसाद, फर्रुखाबाद (करीब 6 साल), अजित कुमार, सोनभद्र (करीब 5 साल), मनोज राज, प्रयागराज (करीब 5 साल), अखिलेंद्र दूबे, लखनऊ (करीब 4 साल) और मोहम्मद जफर, कानपुर-संबद्ध मुख्यालय (करीब 5 साल)।
डेढ़ से दो वर्ष में हुआ इन डीपीओ का तबादला
नाम -- कहां से कहां
वाणी वर्मा -- मुजफ्फरनगर से मिर्जापुर
इफ्तखार -- अहमद वाराणसी से जालौन
शैलेंद्र कुमार राय -- महाराजगंज से कुशीनगर
दुर्गेश प्रताप सिंह -- उन्नाव से वाराणसी
कृष्ण मुरारी -- बलरामपुर से बलिया
दुर्गेश कुमार -- मऊ से महराजगंज
तबादले से बचने वालों में दो ऐसे अधिकारी भी शामिल हैं, जिन पर गंभीर आरोप लगे हैं। एक हैं मनोज राव, इनके खिलाफ प्रयागराज में कुंभ घोटाले के खिलाफ सतर्कता जांच चल रही है। आरोप है कि इन्होंने एक टेंट कंपनी का फर्जी बिल वाउचर लगाकर 35 लाख रुपये का भुगतान करा दिया था। मुख्यालय और सीडीओ की जांच पूरी हो गई है। गोंडा में तैनाती के दौरान इन पर भी आंगनबाड़ी केंद्र के निर्माण में वित्तीय अनियमितता बरतने के मामले की जांच हो रही है। दूसरे डीपीओ हैं मोहम्मद जफर। ये जुलाई 2016 से कानपुर में तैनात हैं। इन्हें महिला सहकर्मी के साथ अश्लीलता का आरोप लगने के बाद लगभग एक साल से मुख्यालय से संबद्ध किया गया है। इन पर भी गोंडा में तैनाती के दौरान पोषाहार को हुए नुकसान के मामले में वसूली हो रही है।
आईसीडीएस की निदेशक डॉ. सारिका मोहन का कहना है कि तबादले में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं है। चूंकि अधिकतम 20 प्रतिशत कार्मिकों के ही तबादले किए जाने थे। इसलिए समय पूरा होने के बाद भी सभी लोगों का तबादला नहीं किया जा सकता।