जांच रिपोर्ट के मुताबिक 2003 में कनिष्ठ लिपिक के पद पर भर्ती हुए अजीत प्रताप यादव पर अफसर इतने मेहरबान हुए कि उन्हें एक ही दिन में दो प्रमोशन दे दिए। अजीत को 1 सितंबर 2012 को कनिष्ठ लिपिक से वरिष्ठ लिपिक और फिर प्रधान सहायक के पद पर प्रोन्नति देते हुए 4200 का ग्रेड पे दे दिया गया।
नियमानुसार एक पद पर कम से कम पांच साल की सेवा के बाद ही प्रमोशन देने का प्रावधान है। रिपोर्ट में पांच अन्य कनिष्ठ लिपिकों को भी प्रधान सहायक के पद पर प्रमोशन दिए जाने का जिक्र है। इनमें कुलदीप सिंह, गिरीशचंद्र डिमरी, राजेश काके, नीलम शुक्ला व सरिता सिंह शामिल हैं।
शासनादेश जारी होने के तीन साल पहले ही दे दिए लाभ
ऑडिट टीम को जांच के दौरान पता चला कि बहुत से कर्मियों को 1 सितंबर 2012 को ही वे सारे लाभ दे दिए गए, जिसे देने के लिए सरकार ने 15 अक्तूबर 2015 को शासनादेश जारी कर मंजूरी दी। यानी शासनादेश जारी होने के तीन साल पहले ही प्रमोशन व एसीपी समेत सारे लाभ दे दिए गए। इसके लिए न तो वरिष्ठता सूची बनाई गई और न ही नियमावली में संशोधन कर कैबिनेट से ही मंजूरी ली गई।
कनिष्ठ लिपिक से वरिष्ठ सहायक : अजय कुमार बाजपेई, प्रकाश वीर सिंह, अनिल कुमार श्रीवास्तव, ओंकारनाथ गोंड, उपेंद्र कुमार श्रीवास्तव, रिजवान अहमद, राजेंद्र प्रसाद कन्नौजिया, तेजपाल सिंह, राजदेव प्रधान, योगेंद्र कुमार यादव, लाल बिहारी, सतीश कुमार वर्मा, राजेंद्र कुमार शुक्ला, सुषमा बहुगुणा, श्याम नारायण, उषा श्रीवास्तव, बजरंग बली पांडेय, निशा शुक्ला, अभिषेक वाजपेई व विशाल श्रीवास्तव।
चतुर्थ श्रेणी से कनिष्ठ लिपिक : राम कुमार, सत्य नारायण, राजाराम गौड़ व मधु बहल।
मामले पर बाल विकास एवं पुष्टाहार प्रमुख सचिव मोनिका एस गर्ग का कहना है कि आंतरिक लेखा एवं लेखा परीक्षा की जांच रिपोर्ट मिलने के बाद निदेशक बाल विकास एवं पुष्टाहार से रिपोर्ट मांगी गई है। रिपोर्ट आने के बाद ही साफ हो सकेगा कि मामले में कौन कितना जिम्मेदार है। उसी के आधार पर ही आगे की कार्रवाई होगी।