एक दिन पहले घोषित हुए यूपीएससी परीक्षाओं के रिजल्ट में फिजिकली हैंडीकेप इरा सिंघल ने टॉप किया। आईएएस परीक्षा में पहला स्थान प्राप्त करने वाली इरा जैसी बेटियां लखनऊ में भी हैं।
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इन सभी में वैसा ही हौसला। वही जज्बा। शारीरिक चुनौतियों के बीच संघर्ष और सफलता का उनका सिलसिला चल निकला है। बचपन से बोलने-सुनने में अक्षम 21 वर्षीय विनीता पांडेय हमेशा रेग्युलर स्कूलों में पढ़ी।
इंटरमीडिएट तक वह फर्स्ट डिवीजन हासिल करती रहीं। वह बोल नहीं पाती,लेकिन लिप रीडिंग कर सकती है और साइन लैंग्वेज के जरिये संवाद करती है। पढ़ने में हिंदी व इंग्लिश दोनों को कमांड रखती है।
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पिता डॉ.डीके पांडेय बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली परीक्षा पास कर उसने एनआईएफटी में एडमिशन लिया तो उन्हें शंका थी कि शायद वह पढ़ नहीं पाएगी। उन्होंने एडमिशन के दौरान संस्थान में कह दिया था कि अगर विनीता पहले सेमेस्टर को पास न कर पाई वे उसे कोर्स से निकलवा लेंगे।
उन्हें यह विनीता के लिए कठिन लग रहा था। लेकिन उनकी आशंका के विपरीत उसने न केवल सेमेस्टर पास किए,बल्कि इसी वर्ष जब कोर्स पूरा हुआ इंटीरियर डिजाइनिंग में गोल्ड मेडल हासिल किया। देश में इससे पहले यह उपलब्धि किसी ने हासिल नहीं की।
'जहां जाती हूं,पूछा जाता है-कैसे चुनौतियों का सामना करोगी?’
अपने माता-पिता अनीता और शेषपाल सिंह को अपनी हर सफलता का श्रेय देने वाली नीतू सिंह को चलने फिरने के लिए किसी न किसी पर निर्भर रहना पड़ता है।
वे बताती हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती किसी स्थान पर पहुंचना होती है। यही वजह है कि शुरुआती शिक्षा उन्होंने घर में ली फिर घर के पास एक स्कूल से आगे पढ़ाई की और कक्षा 8 पास की।
उनके लिए आठवीं के बाद आगे एडमिशन लेना एक तनाव बन गया। ज्यादातर स्कूलों में एडमिशन के लिए मना कर दिया गया। एक गर्ल्स इंटर कॉलेज में एडमिशन लेने पहुंची तो कहा गया कि क्लासेज ऊपर चलती हैं और लैब नीचे है।
प्रिंसिपल ने साफ कह दिया कि एडमिशन नहीं दे सकते। हालांकि शिक्षिका पूनम ने उसमें प्रतिभा देखी और कहा कि उनके लिए पूरी क्लास ही नीचे की मंजिल पर लगाई जाएगी।
इसके बाद वह एडमिशन पा सकीं। वहीं से पढ़कर विभिन्न कोर्स करते हुए उन्होंने शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय के बीएड कोर्स में एडमिशन पाया और अपने वर्ग में गोल्ड मेडल हासिल किया।
नीतू सिंह बताती हैं कि 12वीं के बाद सीपीएमटी में उनकी जनरल रैंक 6 हजार आई। बीडीएस करना चाहती थी। लेकिन काउंसलिंग के दौरान कहा गया कि ‘डॉक्टर तो मरीज की मदद के लिए होते हैं,आपकी मदद कौन करेगा’और एडमिशन नहीं दिया गया।
कुछ समय पूर्व विप्रो में मैसूर के लिए उनका चयन हुआ था, लेकिन शारीरिक चुनौती की वजह से जा नहीं सकी। फिलहाल वे प्रशासनिक सेवाओं के लिए तैयारी में जुटी हैं और मानती हैं कि एक न एक दिन सफलता जरूर हासिल करेंगी।
अंधेरे में आगे बढ़ बना लिए रास्ते
18 वर्षीय नेहा ने 2014 में 68 प्रतिशत अंकों के साथ दसवीं पास की तो वहीं अब बायोलॉजी पढ़ते हुए क्लास 11 में डिस्टिंक्शन हासिल की। वे जन्म से दृष्टि बाधित हैं।
नेहा बताती हैं कि निश्चित तौर पर अपनी शारीरिक चुनौती की वजह से रोजमर्रा के सामान्य काम करने में भी भारी दिक्कतें आती हैं। स्कूली पढ़ाई के साथ-साथ इन चुनौतियों को पार पाना उनके लिए जरूरी था।
इसमें शिक्षकों ने मदद की जो बोर्ड पर लिखकर पढ़ाने के साथ साथ खासतौर से उनके लिए लेक्चर में उसे दोहराकर पढ़ातीं। नेहा बताती हैं कि भविष्य में क्या करना है,यह उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार तय करना होगा। फिलहाल वे मन मुताबिक मेडिकल क्षेत्र में नहीं जा सकतीं इसलिए शिक्षण के क्षेत्र में जाने का ख्वाब देख रही हैं
इरा जैसी उपलब्धि करनी है हासिल
अपनी शारीरिक चुनौती की वजह से दीपमाला गौतम के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना है। हालांकि इससे पार पाते हुए उन्होंने खुद को जिस उपलब्धि पर पहुंचाया है,उसे बनाए रखना भी वे कम चुनौती पूर्ण नहीं मानती हैं।
दीपमाला बताती हैं कि इंदिरानगर के सेक्टर-12 में रहते हुए शकुंतला विवि में जब उन्होंने एडमिशन लिया तो समझ नहीं पा रही थीं कि वहां पहुंचकर पढ़ाई कैसे करेंगी। लेकिन परिवार ने उन्हें हर तरह से मदद की।
वे बताती हैं कि एक चीज उठाकर उसे वापस सही जगह रखने लायक मूवमेंट भी नहीं कर पाती, लेकिन जब मन में पढ़ाई के लिए लगन पैदा हुई तो अपने बीए कोर्स को ही अपना लक्ष्य बनाया। बीते वर्ष उन्हें कोर्स पूरा करने पर अपनी श्रेणी में गोल्ड मेडल से नवाजा गया,जिसे वे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती हैं।
इरा सिंघल की उपलब्धि को दीपमाला प्रेरणास्रोत मानती हैं। कहती हैं कि उन्होंने जो किया वो सभी के लिए अनुकरणीय है। निश्चित तौर पर उन्होंने कड़ी मेहनत की है जो शायद कोई सामान्य व्यक्ति नहीं कर सकता। 25 वर्षीय दीपमाला खुद भी ऐसा करना चाहती हैं।
एक सामाजिक संगठन के साथ जुड़े डॉ.मृदुला वशिष्ठ समाज के उस तबके लिए काम कर रही हैं,जो डिसएबिलिटी का शिकार हैं।अपनी संघर्ष के बारे में मृदुला केवल इतना ही कहती हैं वे अपना ग्रेएजुएशन पूरा होने तक कभी नहीं सोच सकीं थीं कि समाज के लिए कोई काम कर सकेंगी।
लेकिन विवाह के बाद उनके पति अमिताभ मेहरोत्रा के प्रोत्साहन से उन्होंने खुद को कमजोर मानने की प्रवृत्ति से बाहर निकाला। इसके बाद महिलाओं के लिए वोकेशनल कोर्सेज शुरू किए,जिन्हें पूरा करने के बाद वे उन्हें स्वरोजगार शुरू करने में मदद भी कर रही हैं।