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'आईएएस परीक्षा मानकर की बैडमिंटन चैंपियनशिप की तैयारी'

Wed, 30 Nov 2016 10:39 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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सुहास एलवाई - फोटो : amar ujala
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बीजिंग में इतिहास रचकर देश का मान बढ़ाने वाले आजमगढ़ के जिलाधिकारी और 2007 बैच के आईएएस अधिकारी सुहास एलवाई ने अपने जज्बे और जुनून से साबित कर दिया कि यदि लक्ष्य के प्रति समर्पण हो तो जिंदगी में किसी भी चुनौती से पार पाया जा सकता है।
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चीन की राजधानी बीजिंग में एशियन पैरा-बैडमिंटन चैंपियनशिप जीतकर मंगलवार को राजधानी लौटे सुहास आलमबाग स्थित अपने श्वसुर रमेशचंद्र शर्मा और सास जनक दुलारी के आवास पर ‘अमर उजाला’ से मुखातिब हुए।

बताया कि किस तरह कठिन हालात में इस स्पर्धा को जीतने के  लिए खुद को तैयार किया। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश:

सवाल- बैडमिंटन आपका पैशन कैसे बना?

जवाब - पिताजी बॉल बैडमिंटन के अच्छे खिलाड़ी थे। वे जब खेलते तो मुझे अक्सर स्कोरिंग में लगा दिया जाता। वहां घर के पास मिट्टी में कोर्ट बना था। मैंने पहले बॉल बैडमिंटन पकड़ा। आउटडोर खूब खेला। इनडोर का अवसर कम था। स्कूल लेवल पर क्रिकेट, वॉलीबॉल में मुझे अवार्ड भी मिले। पर, बैडमिंटन में प्रोफेशनली तब खेलना शुरू किया जब आईएएस में आया। ट्रेनिंग एकेडमी में बैडमिंटन व स्क्वैश में कई बार चैंपियन तो कई बार रनर अप रहा। फील्ड में पोस्टिंग मिली तब भी मैंने रोजाना एक-डेढ़ घंटे बैडमिंटन के लिए निकालने की कोशिश की।
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'18 किलोमीटर दूर आजमगढ़ खेलने जाता ‌था'

सवाल- दिव्यांग खिलाड़ियों को नियति को चुनौती देकर स्थान बनाना होता है। कौन सी ताकत है जो प्रेरित करती है?

जवाब - पढ़ाई हो या प्रशासनिक जिम्मेदारी, मेरा लक्ष्य स्पष्ट रहा है। खेल के प्रति जुनून होना चाहिए। सफलता के लिए सर्वोत्तम प्रयास की जरूरत होती है। मैं आजमगढ़ की सगड़ी तहसील में एसडीएम रहा हूं। वहां बैडमिंटन कोर्ट नहीं था। मैं रोज खेलने के लिए 18 किमी दूर आजमगढ़ जाता था। आगरा में भी रहा। वहां अच्छे खिलाड़ी थे। भरपूर सहयोग मिला।

सवाल- अपना पैसा खर्च करके आप इस चैंपियनशिप में शामिल हुए। पर, सरकारें तो खेलों के नाम पर करोड़ों-अरबों खर्च कर रही हैं? क्या जहां देना चाहिए वहां नहीं दे रहे? खेल नीति में क्या बदलाव होना चाहिए?

जवाब - पैरा स्पोर्ट्स में खिलाड़ियों को प्रोत्साहन की काफी गुंजाइश है। सरकार इसमें बेहतरी को लेकर तत्पर है। जहां तक खिलाड़ियों को आर्थिक सहायता देने की बात है तो सरकार दे रही है। मेरे साथ अबूह उबैदा भी इस चैंपियनशिप में हिस्सा लेने गए थे। सरकार से उन्होंने सहयोग मांगा। मुख्यमंत्री ने उन्हें 1.13 लाख रुपये की मदद की। मैं अपने खर्च पर जा सकता था इसलिए मैंने मांगा ही नहीं। मेरा मानना है कि सही समय पर सही जगह एप्रोच किया जाए तो सहायता मिल सकती है।

'जीवन के हर क्षेत्र में मदद करती है खेल भावना'

सवाल- खेल भावना प्रशासनिक कार्य में कितनी मदद करती है?

जवाब - खेल भावना जीवन के हर क्षेत्र में मदद करती है। जिस तरह खेल एक चुनौती है, वैसे ही प्रशासनिक दायित्व भी चुनौतीपूर्ण होते हैं। खिलाड़ी खेल में जीत के लिए अपना सर्वस्व लगा देता है। हार व जीत लगी रहती है। वह एक  मुकाबला हारता है तो दूसरी प्रतिस्पर्धा के लिए दुगुनी ताकत से जुट जाता है। उसी तरह प्रशासनिक दायित्व में भी सफलता-विफलता लगी रहती है। खेल की तरह हर टास्क में शत-प्रतिशत देना चाहिए। विफलता पर हताश नहीं होना चाहिए।

सवाल- एशियन पैरा-बैडमिंटन चैंपियनशिप में जीत को लेकर किस तरह की तैयारी की? क्या जीत के प्रति पहले से आश्वस्त थे?

जवाब - करीब तीन महीने पहले चैंपियनशिप के बारे में जानकारी मिली। मैं प्रोफेशनल नहीं, शौकिया खिलाड़ी हूं। इसलिए सफलता को लेकर हिचक थी। गोल्ड मेडल मिल जाएगा, यह सोचा भी नहीं था। मगर कोई कोर कसर नहीं छोड़ूंगा, यह तय करके आवेदन किया। बोर्ड परीक्षा, आईएएस परीक्षा मानकर तैयारी की। बैडमिंटन में चीन, इंडोनेशिया, मलयेशिया और कोरिया के नामचीन खिलाड़ियों का दबदबा रहता है। इन्हें हराना मुश्किल है। यू ट्यूब पर इन खिलाड़ियों का खेल देखा।

इस तरह मिली प्रतियोगिता में इंट्री

सवाल- प्रतियोगिता के लिए किस तरह चयन हुआ?

जवाब - मेरी वर्ल्ड रैंकिंग नहीं थी, इसलिए मुझे राउंड राबिन में तीन, प्री क्वार्टर फाइनल, क्वार्टर फाइनल, सेमीफाइनल और फाइनल में कुल सात मैच खेलने पड़े। वर्ल्ड रैंकिंग वालों को पांच गेम ही खेलने पड़ते हैं।

सवाल- बीजिंग में किस तरह की चुनौतियां सामने आईं?

जवाब - जब मैं बीजिंग पहुंचा तो वहां अधिकतम तापमान माइनस एक व न्यूनतम माइनस आठ था। हम लोगों की 15-20 डिग्री में रहने की आदत होती है। ऐसे में अपने को फिट रखना सबसे बड़ी चुनौती थी। इसके लिए अतिरिक्त वार्म-अप करना पड़ा। दूसरा, वहां आपको प्रोत्साहित करने वाले समर्थक कम होते हैं। इसलिए खुद को मानसिक रूप से तैयार किया। मैं पहला सेट हार गया था। दूसरे सेट में 11-9 से पीछे था। पर, आत्मविश्वास नहीं खोया और जीत हासिल की।

सवाल - जीत के लिए दूसरों से हटकर क्या किया?

जवाब - जुनून पैदा करने के लिए मैं गाने सुनता हूं। ‘लक्ष्य’ मूवी का गाना है..लक्ष्य को हर हाल में पाना है...। खेलने के पहले मैं करीब 50 बार यह गाना गुनगुनाता था। फाइनल में ‘चक दे इंडिया’ का गाना दो बार सुनकर गया। कैलाश खेर का चक लेन दे...भी मैं खूब सुनता हूं। ये गाने मोटिवेट करते हैं।

'इस प्रोफेशनल खिलाड़ी ने की मदद'

सवाल- आप इस जीत में और भी किसी का योगदान मानते हैं?

जवाब : बैडमिंटन के प्रोफेशनल खिलाड़ी गौरव खन्ना ने मेरी काफी मदद की। उन्होंने तमाम महत्वपूर्ण तकनीकी बातें बताईं। अंडर-19 खेलकर राष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करने वाले प्रोफेशनल खिलाड़ियों के साथ बैडमिंटन खेला।

सवाल - बतौर प्रशासनिक अधिकारी खेलों को प्रोत्साहित करने के लिए क्या कदम उठाए हैं?

जवाब - मैं जहां भी रहा, खेलों को प्रोत्साहित करने की पूरी कोशिश की। हाथरस, जौनपुर, आजमगढ़ में मैंने बैडमिंटन कोर्ट को दुरुस्त कराया। खेल से जुड़ी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया। इससे बच्चे खेल में आगे बढ़ सकते हैं।
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बैडमिंटन में मलेशियाई खिलाड़ी ली चांग वे हैं आदर्श

सवाल - आप किससे प्रेरित होते हैं?

जवाब - मेरे हीरो मेरे स्वर्गीय पिताजी यथिराज आयंगर हैं। उनकी बताई बातें हमेशा दिशा देती हैं। बैडमिंटन में मैं विश्व के नंबर एक मलयेशियाई खिलाड़ी ली चांग वे को आदर्श मानता हूं। मैंने यू ट्यूब पर उनके सारे मैच देखे हैं। उनकी तकनीक, फुटवर्क, हैंड मूवमेंट, तेजी को समझा है। पत्नी व परिवार का प्रोत्साहन भी बहुत अहम है, जो भरपूर मिलता है।

सवाल : खेलों के प्रोत्साहन के लिए क्या कहना चाहेंगे?

जवाब : आज तमाम लोग कंप्यूटर, मोबाइल पर गेम खेलते हैं। मैं मिट्टी में खेलता था। मेरा मानना है कि बच्चों को शुरू से ही खेलों से जोड़ें। उन्हें प्रोफेशनल खिलाड़ी बनाएं, न बनाएं, उन्हें एक घंटा घर के बाहर मैदान में जरूर खेलने का मौका दें। वे स्वस्थ रहेंगे, फिट रहेंगे।
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