वक्त ने उसके घाव तो नहीं भरे... पर वह खुद मजबूत होती चली गई... इतनी कि कहती है- उस रास्ते से भी गुजरूंगी जिस रास्ते पर उस दरिंदे का घर है... दिखाना है मुझे उसकी हैवानियत से कहीं ज्यादा है मेरा हौसला ... टूटना नहीं है मुझे... पढ़ना है... खुद का वजूद गढ़ना है... नई पहचान से दुनिया को रूबरू कराना है मुझे...
लखनऊ से बिल्कुल सटा हुआ है उस मासूम बच्ची का गांव। शहर पीछे छूटते ही शुरू हो जाती हैं पथरीली राहें। इक्का-दुक्का बच्चों का शोर सुनाई दे जाता है या कहीं-कहीं सरसों की मड़ाई करती महिलाएं दिख जाती हैं।
वरना तो तेज धूप में खेत-खलिहान में सन्नाटा ही पसरा है। यह टूटता तब है जब उस मासूम की सिसकियां रह-रह कर सुनाई पड़ती हैं। मुलाकात पहले से ही तय थी।
कार का दरवाजा खुलते ही 14 साल की एक बच्ची झोपड़ी के दरवाजे पर लटकी एक पुरानी सी साड़ी के पर्दे की ओट से झांकती है और फिर अंदर चली जाती है।
उसकी बड़ी बहन हमें लेने आती है। पुआल की छत के नीचे झोपड़ी के एक कोने पर कुछ किताबें बिखरी पड़ी थीं। उन्हीं किताबों के बीच साड़ी के पर्दे की ओट से झांकने वाली मासूम तन्मयता के साथ कुछ पढ़ रही थी।
अब मुझे पढ़ना है, मैं खुद लडूंगी अपनी लड़ाई
रेप पीड़िता
- फोटो : अमर उजाला
...तब उसे अस्पताल के बेड पर देखा था... चेहरा चादर से आधा ढंका हुआ था... पीड़ा साफ झलक रही थी... अब स्वस्थ और सचेत हालत में मेरा उससे यह पहला सामना था।
एक खामोशी के बीच वह सिर्फ खड़ी होकर हमारा स्वागत करती है, हाल पूछने पर इतना ही कह पाती है, अब पढ़ना है, पापा एडमिशन करवा दें बस। उसके बाद खुद लड़ूंगी अपनी लड़ाई।
हमें देखते-देखते अचानक उसका चेहरा भीग जाता है। थोड़ा संभलती है और अपने आंसू पोंछती है। फिर हमसे खेत की ओर चलने को कहती है। रास्ते से गुजरते समय वह उस घर की ओर इशारा कर कहती है कि यहीं तो रहता है वह दरिंदा।
अक्सर इस रास्ते से गुजरते समय उसके परिवार के लोगों की गालियां हमें सुननी पड़ती हैं। खेत में पहुंचते हैं तो वह एक जगह पर ठिठक जाती है। फिर इशारे से बताती है, पिछले साल 17 फरवरी को उसके साथ इसी जगह पर दरिंदगी हुई थी।
कहती है, पहले तो यहां आने से डर लगता था, लेकिन अब इस रास्ते से जानबूझ कर गुजरती हूं, क्योंकि बीता कल मुझे हौसला देता है और याद दिलाता है कि अभी बहुत दूर तक जाना है मुझे।
बीता कल अब डराता नहीं, हौसला देता है
रेप पीड़िता
- फोटो : अमर उजाला
कैफी साहब की नज्म की इन लाइनों के साथ इस महिला दिवस पर हम इस्तकबाल करते हैं उस मासूम बच्ची की। अब 14 साल की हो चुकी है वह। अनचाही बच्ची की मां बनने पर मजबूर यह बच्ची एक साल से एक बेबसी के साथ जी रही थी... पर गुजरते वक्त ने हौसला दिया...
शारीरिक और मानसिक चोट की असहनीय पीड़ा के साथ जीते हुए जमाने का सामना करने के लिए वह तैयार है। उसे पढ़ना है, आगे बढ़ना है... बस कुछ दिन का इंतजार है। राजधानी के एक स्कूल में एडमिशन को लेकर वह उत्साहित है... आत्मविश्वास से भरी हुई सी है।
साथ की लड़कियों को देखती है तो उदास हो जाता है चेहरा
हमसे बात करते-करते अचानक उसकी उम्र की कुछ लड़कियां खेलती-कूदती और चहकती हुई स्कूल से लौटती दिखाई देती हैं।
उन्हें देखकर इस मासूम का चेहरा उदास हो जाता है... मुस्कुराना तो वह कबसे भूल चुकी है। शब्दों की जगह उसके आंसुओं ने ले ली है।
एक साल से उसने खुद को घर में कैद सा कर लिया था, कभी-कभी बाहर निकलती थी, पर अब कहती है मुझे बाहर निकलना है, आगे बढ़ना है, मैं पूरी तरह तैयार हूं हर चुनौती के लिए... उसके शब्द सुनकर लगता है मानो 14 साल की उम्र में ही वह काफी बड़ी हो चुकी है...।
मासूम हम सबसे पूछ रही है- होती ही क्यों हैं निर्भया जैसी घटनाएं
रेप
- फोटो : अमर उजाला
धूप में वह मेरा हाथ पकड़कर पेड़ की तरफ ले जाती है जहां कुछ छाया है। चलते-चलते धीरे से पूछती है दीदी, निर्भया के साथ भी तो वही हुआ था, जो मेरे साथ हुआ? क्यों होता है ऐसा? क्या इन्हें रोका नहीं जा सकता? उसका यह सवाल आश्चर्य में डालने वाला था।
घर में बिजली कनेक्शन है नहीं, टीवी तो दूर की बात है। गांव इतना पिछड़ा है कि अखबार तक नहीं आता। वह कहती है, जब स्कूल जाते थे तो सुना था। टीचर लोग बातें करते थे कि दिल्ली में एक लड़की के साथ कुछ लोगों ने गलत काम किया है।
हादसे के बाद दो बहनों की भी पढ़ाई छूट गई
रेप
- फोटो : अमर उजाला
हाईकोर्ट ने तीन नवंबर 2015 को आदेश दिया था कि पीड़िता और उसका परिवार जहां चाहे, उसे एडमिशन मिलेगा। इसी के तहत पिता ने मासूम के एडमिशन के लिए राजधानी में बेसिक शिक्षा अधिकारी के यहां आवेदन किया है। उसे अप्रैल में एडमिशन का आश्वासन दिया गया है।
हमसे बात करते-करते मासूम के आंसू बहने लगते हैं। हम कुछ कहें, इससे पहले ही बड़ी बहन आगे बढ़कर उसे संभालती है। कहती है, क्यों रोती हो तुम? रोना तो उन्हें है, जिनकी वजह से तुम्हारी और हम सबकी यह हालत हुई। उसका गुस्सा जायज है।
मासूम के साथ जो कुछ हुआ, उसके बाद दो और बहनों की पढ़ाई छूट गई। बड़की कहती है कि दीदी, हम लोग बहुत डरने लगे थे। दरवाजे से बाहर झांकने तक में डर लगता था। पर, अब बहुत हुआ, सारा डर खत्म हो चुका है, हम सबको एक नई शुरुआत करनी है।