यह बात दीगर है कि कथक का जन्म मंदिरों में हुआ। चूंकि, मंदिरों में कथाएं कहने वाले कथक कहलाते थे, पर कथक को नृत्य शैली में विकसित करने का श्रेय इलाहाबाद के पं. ईश्वरी प्रसाद को जाता है।
इनके वंशजों ने ही कथक को अवध के नवाब शुजा उद्दौला, आसिफ उद्दौला व नवाब सआदत अली खान के दरबार में पहुंचाया।
ईश्वरी प्रसाद के वंशज ठाकुर प्रसाद से नवाब वाजिद अली शाह ने कथक सीखा।
इन्हीं के वंशजों में शामिल बिंदादीन महराज, कालका महराज, अच्छन महराज, लच्छू महराज, शंभू महराज, बिरजू महराज, राममोहन व कृष्णमोहन ने कथक के इस घराने को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने में योगदान दिया।
इतना ही नहीं इस परिपाटी को डॉ. कपिला राज, कुमकुम धर, कुमकुम आदर्श, मालविका सरकार, सुरेंद्र सैकिया, अर्जुन मिश्र आदि ने लखनऊ घराने के कथक को आगे बढ़ाया।
विदेशियों का पसंदीदा घरानाविदेशियों को कथक का लखनऊ घराना खासा पसंद है। एशिया व यूरोप की ऐसी तमाम नृत्यांगनाएं हैं, जो वर्षों से यहां रहकर न केवल नृत्य सीख रही हैं, बल्कि ऐसी प्रस्तुतियां भी देती हैं कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाए। इनके अधिकांश कार्यक्रम राष्ट्रीय कथक संस्थान के अंतर्गत कराए जाते हैं।
कथक के प्रमुख केंद्रलखनऊ घराने का कथक शहर में भातखण्डे संगीत सम विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय कथक संस्थान और एसएनए स्थित कथक केंद्र में सिखाया जा रहा है। इसके अतिरिक्त कथक नृत्यांगनाएं भी नई पौध विकसित करने के उद्देश्य से कथक की कक्षाएं चला रही हैं।