मध्य प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन ने अपने संस्मरण में लिखा है, ‘शोहदों की एक पूरी जमात रहती थी। किसी की दुकान के सामने पहुंच जाते और आवाज लगाते, ला....दे।’दुकानदार जानबूझकर इन्कार करता। शोहदे कुछ उल्टा-सीधा बोलते। दुकानदार भी कुछ कहता।
शोहदा कहता, ‘अबे लाला! अपनी कमाई लेकर ऊपर जाएगा क्या। बात बढ़ती और गालियों तक आ पहुंचती। शोहदा भी गालियां देने लगता। बाहर से आए लोगों को लगता कि अब मार हुई कि तब मार हुई, लेकिन गालियों के बीच ही दुकानदार पैसे निकालता और हंसते हुए शोहदे को दे देता। शोहदा भी उसे अदब से सलाम करता और आगे बढ़ जाता।
ऐसे ही कुछ सब्जी बेचने वाली महिलाएं थीं। जिनके पास लोग गालियां सुनने जाया करते थे। होता यह था कि सब्जी लेने गए और उसे कुछ कह दिया। बस फिर क्या? गाली पर गाली। पर, क्या मजाल कि सब्जी लेने गया शख्स जरा भी नाराज हो जाए। सब्जी बेचने वाली गलियों पर गालियां दे रही है और सब्जी भी तोलती जा रही है।
सब्जी लेने वाले ने हंसते हुए सब्जी ली और उसे सब्जी से ज्यादा पैसा देकर हंसते-हंसते लौट आए। घर आए तो बोले, ‘आज गालियां सुनने को मिल गई। काफी शुभ रहेगा।’