छात्रवृत्ति और शुल्क भरपाई योजना का लाभ लेने के लिए शिक्षण संस्थान अनाप-शनाप ढंग से अपने यहां अनुसूचित जाति के छात्रों को भर रहे हैं। जिस वर्ग की आबादी करीब 21 फीसदी है, शिक्षण संस्थानों में उस वर्ग के विद्यार्थियों की संख्या 60 फीसदी से भी ज्यादा दिखाई जा रही है। प्रदेश सरकार ने ऐसे मामलों की जांच कराने का निर्णय किया है। इसके लिए सभी जिलास्तरीय अधिकारियों को जरूरी निर्देश भेज दिए गए।
प्रदेश सरकार अनुसूचित जाति व जनजाति के ढाई लाख रुपये तक सालाना आय और अन्य वर्गों के लिए के दो लाख रुपये तक सालाना आय वाले परिवारों के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति योजना का लाभ देती है।
सामान्य व अन्य पिछड़े वर्ग के लिए यह योजना बजट आधारित है। यानी उपलब्ध बजट में वरीयता सूची बनाकर छात्रों को योजना का लाभ दिया जाता है। सामान्य व पिछड़े वर्गों के जो छात्र उपलब्ध बजट में योजना का लाभ पाने से वंचित रह जाते हैं, उनकी देयता अगले वित्त वर्ष में हस्तांतरित नहीं होती है।
वहीं, अनुसूचित जाति व जनजाति के शत-प्रतिशत पात्र छात्रों को योजना का लाभ दिए जाने का प्रावधान है। इसमें केंद्र सरकार भी आर्थिक मदद देती है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में शिक्षण संस्थान अपने यहां अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों का दाखिला दिखाते हैं, ताकि सरकार से शुल्क भरपाई होने पर अपनी फीस वसूल लें। देखने में आया है कि इसकी आड़ में तमाम फर्जी छात्रों को भी दाखिला दे दिया जाता है।
शासन और समाज कल्याण निदेशालय ने सभी जिलों के अधिकारियों को भेजे निर्देशों में कहा है कि जिन निजी शिक्षण संस्थानों ने 30 प्रतिशत से ज्यादा अनुसूचित जाति के छात्र दिखाकर योजना का लाभ लिया हो, उनकी गहन जांच कराई जाए।
जिन निजी शिक्षण संस्थानों ने एक वित्त वर्ष में शुल्क भरपाई के रूप में एक करोड़ रुपये से ज्यादा हासिल किए हों, उनकी भी जांच हो। पिछले तीन साल के रिकॉर्ड का सत्यापन किया जाएगा।
समाज कल्याण विभाग के निदेशक बालकृष्ण त्रिपाठी का कहना है कि किसी संस्थान में 30 प्रतिशत से ज्यादा एससी छात्र होने या एक करोड़ से ज्यादा भुगतान होने पर सत्यापन का प्रावधान कड़ाई से लागू किया जाएगा।