नगर निकाय चुनाव के आरक्षण के इंतजार में महापौर से लेकर नगर पंचायत अध्यक्ष पद के दावेदारों के साथ राजनीतिक दलों दिक्कतें बढ़ती जा रही है। आरक्षण निर्धारित होने से पहले ही सभी नगर निगमों में महापौर और प्रमुख नगर पालिका परिषदों में अध्यक्ष पद के दावेदारों की लंबी सूची बन गई है। इससे एक ओर जहां दावेदारों के बीच राजनीतिक खींचतान बढ़ रही है। वहीं आरक्षण निर्धारण और अधिकृत प्रत्याशी घोषित होने के बाद राजनीतिक दलों के सामने असंतोष को थामने की बड़ी चुनौती होगी।
प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में दोबारा भाजपा सरकार बनने के बाद निकाय चुनाव को लेकर दावेदारों ने करीब छह महीने पहले ही तैयारी शुरू कर दी थी। खासतौर पर विधायक का टिकट मिलने से वंचित रहे नेता नगर निगम में महापौर और नगर पालिका परिषदों में अध्यक्ष का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों पर उसी वर्ग के प्रत्याशी उतारे जाने हैं। लिहाजा टिकट की दावेदारी को लेकर सबसे ज्यादा संघर्ष सामान्य वर्ग की सीटों के लिए है। पिछड़े वर्ग के वोट बैंक को साधे रखने के लिए भाजपा सहित सभी राजनीतिक दल सामान्य की सीट पर भी पिछड़े वर्ग के उम्मीदवार को प्रत्याशी बनाएंगे। ऐसे में सामान्य वर्ग के दावेदारों की दिक्कतें भी बढ़ी हुई है।
पार्टी मुख्यालय से मंत्रालय तक चक्कर लगा रहे दावेदार
नगर निगम के वर्तमान महापौर और नगर पालिका परिषद के मौजूदा अध्यक्षों के साथ आगामी चुनाव में इन पदों पर टिकट के दावेदार आरक्षण के लिए पार्टी मुख्यालय से लेकर नगर विकास मंत्रालय तक चक्कर लगा रहे है। दावेदार पार्टी में चुनाव प्रबंधन से जुड़े पदाधिकारियों को अपने अपने हिसाब से आरक्षण निर्धारण को लेकर संतुष्ट करने में जुटे हैं। वहीं मंत्रालय से भी संभावित आरक्षण के लिए पूछताछ कर रहे हैं।
दिग्गजों के अरमानों पर फिर जाएगा पानी
प्रदेश सरकार के मंत्रियों, पार्टी के सांसद और विधायकों के रिश्तेदारों के साथ पूर्व विधायक भी नगर निगम में महापौर और नगर पालिका परिषद में अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे है। 2011 की जनगणना और चक्रानुम के हिसाब से सभी दिग्गज दावेदार अपनी-अपनी सीट को खुद के हिसाब से आरक्षित होना तय मान रहे है। जानकारों का मानना है कि निकाय चुनाव के लिए आरक्षण निर्धारित होने के बाद कई दिग्गजों के अरमानों पर पानी फिर जाएगा। पार्टी के सूत्रों का कहना है कि मंत्रियों, विधायकों और सांसदों ने आरक्षण अनुकूल नहीं होने पर अपने करीबी दूसरी जाति के उम्मीदवार भी तैयार कर रखे हैं।
सपा और बसपा का विकल्प चुन सकते हैं दावेदार
पार्टी सूत्रों के मुताबिक पार्टी के प्रदेश नेतृत्व के सामने चुनाव में जीत के साथ असंतोष रोकने की भी बड़ी चुनौती है। नगर पालिका परिषद और नगर पंचायत अध्यक्ष का टिकट नहीं मिलने से नाराज दावेदार सपा और बसपा से टिकट लेने का विकल्प चुन सकते हैं। निकाय चुनाव बेहद स्थानीय होने के कारण दावेदारों की बगावत और उनके समर्थक कार्यकर्ताओं की नाराजगी का असर चुनाव पर पड़ेगा।