बलरामपुर अस्पताल में ऑटिज्म दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम हुआ। स्वयं
लखनऊ। ऑटिज्म के लक्षण बचपन में ही दिखाई देने लगते हैं। बच्चे का नाम बुलाने पर प्रतिक्रिया नहीं देता है। आंखों में संपर्क से बचता है। बोलने में देरी, बार-बार एक ही बात दोहराता है। ये लक्षण नजर आएं तो परिजनों को सतर्क हो जाना चाहिए। समय पर जांच व इलाज से बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। यह जानकारी बलरामपुर अस्पताल की निदेशक डॉ. कविता आर्या ने दी। बृहस्पतिवार को बलरामपुर अस्पताल में ऑटिज्म जागरूकता दिवस कार्यक्रम में बोल रही थी।
निदेशक डॉ. कविता आर्या ने कहा कि ऑटिज्म का पूर्ण इलाज नहीं है। समय पर पहचान और प्रारंभिक हस्तक्षेप से बच्चे के व्यवहार आदि में सुधार संभव है। नियमित थेरेपी, विशेष शिक्षा और परिवार के सहयोग से बच्चों को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। सीएमएस डॉ. हिमांशु चतुर्वेदी ने बताया कि आटिज्म पीड़ित बच्चे बोलने में देरी करते हैं। कई बार बच्चे बिलकुल भी बोल नहीं पाते हैं। दूसरों के साथ खेलने या घुलने-मिलने में दिलचस्पी कम दिखाते हैं। रोजमर्रा की दिनचर्या में बदलाव से चिड़चिड़ापन या गुस्सा करते हैं।
जागरूकता कार्यक्रम हुआ
विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के अवसर पर सीतापुर-हरदोई रोड स्थित निजी संस्थान में द होप फाउंडेशन के सहयोग से एचसीओपी सेमिनार हॉल में ''समझो, पहचानो, बदलो'' जागरूकता कार्यक्रम एवं नि:शुल्क डेवलपमेंट असेसमेंट कैंप का आयोजन किया गया। विशेषज्ञों ने समाज में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (न्यूरोडाइवर्स) के प्रति जागरूकता बढ़ाने, विकास संबंधी विलंब की समय रहते पहचान करने और व्यवहार, भाषा एवं सीखने से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए विचार रखे। साथ ही ऐसे बच्चों के सर्वांगीण विकास में फार्मेसी की भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की गई।