मिशन पंचायत चुनाव में फतह के लिए भाजपा के रणनीतिकारों को पहले अपने ही स्थानीय नेताओं के कबीलों से पार पाना होगा। बिना इसके मिशन की कामयाबी आसान नहीं दिख रही है।
भले ही इन नेताओं का समर्थन पार्टी उम्मीदवारों को बहुत लाभ न पहुंचा पाता हो, लेकिन इनकी बेरुखी उम्मीदवारों का नुकसान जरूर कर देगी।
पार्टी के रणनीतिकार और मौजूदा नेतृत्व भले ही यह तर्क दें कि लोकसभा चुनाव में तमाम लोगों के विरोध के बावजूद पार्टी को सूबे में अब तक की सबसे बड़ी जीत मिली। पर, राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो लोकसभा और पंचायत चुनाव में बहुत फर्क होता है।
लोकसभा चुनाव मुख्य रूप से पार्टी की धारा और केंद्र में सरकार बनवाने के लक्ष्य पर केंद्रित होते हैं। इसलिए किसी एक चेहरे के सहारे भी चुनाव लड़ा जा सकता है।