अपने शहर के लाल पुल ‘पक्का पुल’ ने नए साल की पहली सेंचुरी मारी है। 10 जनवरी 1914 को बनकर आमजन के आवागमन के लिये तैयार हुये पुल ने शुक्रवार को अपने 100 साल पूरे कर लिए।
अवध केनवाब आसिफुद्दौला के समय केपुराने शाही पुल को 1911 में कमजोर करार देकर तोड़े जाने के बाद अंग्रेज अधिकारियों ने 10 जनवरी 1914 बनाकर लखनऊ की जनता को सौंपा था।
लोग इस अनोखी और उस समय केसबसे विशाल माने जाने वाली कृति से बलखाती गोमती नदी का दीदार आराम से कर सकें इसके लिए भी लार्ड हडिंग ने इंतजाम किए थे। अधिकारियों और इंजीनियरों ने यहां पुल के दोनों ओर 6-6 नक्काशीदार अटारियां (बालकनी) भी बनवाई।
पुल के दोनों ओर लगभग 10 मीटर ऊंचाई केभारी भरकम कलात्मक स्तंभ भी बनवाए।
नगर के इतिहासकार डॉ. योगेश प्रवीण ने बताया कि अंग्रेजों की ये कृति इस मायने में भी खास है कि आज भी इसकी बनावट बेजोड़ है। ये कलात्मक रूप से मजबूत है और आज के पुलों को देखें तो बुनियादी तौर पर तो मजबूत है ही।
पुल से बेगम लेती थी पुल की उतराई
डॉ. यागेश प्रवीण बताते हैं कि पक्के पुल की जगह पहले पत्थर का बना पुल था। जिसे शाही पुल कहा जाता था। शाही पुल इसलिए कि इसकी उतराई टोलटैक्स नवाब आसिफुद्दौला की बेगम शमशुन निशां लेती थीं।
1857 के गदर के बाद जब अंग्रेजों ने अवध संभाला तो उन्होंने पुल को कमजोर करार दे दिया, क्योंकि उनका मानना था कि सेना, तोपों के आने-जाने के बाद से ये कमजोर हो गया है।
तब अंग्रेजों ने इसे तोड़ने का फैसला किया। पुराना पुल 1911 में तोड़ा गया और उसी केसाथ नए पुल की आधारशिला रखी गई। लार्ड हडिंग ने इसका 10 जनवरी 1914 को उद्घाटन किया। इसे चूंकि लालरंग से रंगा पोता गया था, इसलिए इसे लाल पुल या पक्का पुल केनाम से भी जाना जाता है।
गुरप्रसाद थे पक्के पुल के कांट्रैक्टर
तत्कालीन पीडब्ल्यूडी की ओर से बनाए गए इस ऐतिहासिक पक्के पुल के कॉन्ट्रैक्टर गुरप्रसाद थे। अकेले वे ही नहीं पुल के निर्माण में कई अंग्रेज अधिकारियों की टीम भी लगी हुई थी।
एचएस विब्लुड और आरजे पावेल दोनों सुपरिटेंडिंग इंजीनियर, मेजर एसडीए क्रुकशैंक, एसी वैरियर्स और कैप्टन जेए ग्रीम तीनों एग्जीक्यूटिव इंजीनियर रहे। जबकि सीएफ हंटर और एससी एडगर्ब पुल निर्माण केसमय असिस्टेंट इंजीनियर थे।
अवध केनवाब वजीर आसिफुद्दौला केसमय में बनाए गए पुराने शाही पुल के स्थान पर बनाए गए इस पुल को बनाया गया। जो कि यहां से 50 डाउन स्ट्रीम पर मौजूद था।
गदर में खूब दिखता है पक्का पुल
शहर की शूट होने वाली फिल्मों में पक्का पुल खूब दिखता है। सनी देओल की गदर एक प्रेम कथा में तो बकायदा एक चेज सीन तक इस पर फिल्माया गया, जिसे देखने को शहरी खूब उमड़े।
इसके अलावा हाल ही में शहर में शूट हुई यशराज बैनर की फिल्म दावत-ए-इश्क में भी कई सीन इसके आसपास फिल्माए गए। कई फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में लखनऊ की पहचान दिखाते स्थलों में रूमी दरवाजे, घंटाघर के बाद यही पुल बाजी मारता है।