जब 1914 में प्रथम विश्वयुद्घ शुरू हुआ, उसी दौरान हरियाणा से आए पांच दोस्तों बंशीधर अग्रवाल, बाबूरामानंद, धूमिराम, शिवलाल और रामेश्वर दास ने नयागंज (डालीगंज) में ऐतिहासिक होली की नींव डाली।
नयागंज सेवा समिति के शिव बिहारी अग्रवाल बताते हैं कि इस बार 16 मार्च को होलिका दहन के साथ ही यहां की होली और इस मुहल्ले के सौ वर्ष पूरे हो जाएंगे।
उन्होंने बताया कि तकरीबन सौ साल पहले ही नयागंज बसा था, तब यहां गल्लामंडी होती थी। जो वर्ष 1975 में सीतापुर रोड पर स्थानांतरित कर दी गई।
उन्होंने बताया कि नींव डालने वाले सभी दोस्त मुख्यत: राजस्थान के थे। जो बाद में हरियाणा होते हुए उत्तर प्रदेश में आकर बस गए थे।
उनके द्वारा शुरू की गई परंपरा आज भी होलिका में निभाई जा रही हैं। यहां लकड़ी की जगह उपलों का ही इस्तेमाल किया जाता है।
होलिका के लिए निर्जल व्रत
नयागंज में होलिका दहन से पूर्व महिलाएं दिन में होलिका की पूजा करती हैं। महिलाएं रंगीन धागों को होलिका केचारों ओर लपेटकर उपलों की माला चढ़ाती हैं। इसके बाद ही होलिका का निर्जल व्रत खोलती हैं।
समिति के शिवबिहारी अग्रवाल बताते हैं कि यह परम्परा राजस्थान की है। जो आज भी महिलाओं ने बरकरार रखी हुई है। हालांकि, अब उत्तर भारत में भी महिलाओं ने इस परंपरा को अपनाना शुरू कर दिया है।
लकड़ी सिर्फ प्रतीकात्मक
पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखकर यहां होलिका दहन में लकड़ी का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया जाता है।
यहां के लोग बताते हैं कि चूंकि, लकड़ियों के लिए पेड़ काटे जाते हैं, इसलिए सिर्फ नाममात्र ही इसका प्रयोग होता है, बाकी गोबर के उपले भारी संख्या में होलिका में डाले जाते हैं।
इनका योगदान सराहनीय
सुरेश बंसल, जगदीश प्रसाद अग्रवाल, सुभाष चंद्र अग्रवाल, प्रताप नारायण, अरुण, बिशन चंद्र, विनय, चयन और इति।