शकुंतला बहादुर ने बताया कि उन्होंने लखनऊ में महिला महाविद्यालय से बीए और लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए किया। मेरिट लिस्ट में नाम केसाथ उन्हें सरकार से छात्रवृत्ति मिलती रही। जर्मन एकेडेमिक एक्सचेंज सर्विस की फेलोशिप पर वर्ष 1962-64 तक दो वर्ष वे जर्मनी में भी रहीं।
वहां अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गुरु प्रो. पॉल थीमे के मार्गदर्शन में वैदिक साहित्य पर शोधकार्य किया। इस दौरान वहीं ट्यूबिंगेन विश्वविद्यालय में ही सप्ताह में दो दिन संस्कृत व हिंदी का अध्यापन किया। इसके अलावा यूरोप में पेरिस व बर्लिन की साहित्यिक गोष्ठियों में भी प्रतिभागिता करती रहीं।
वे बताती हैं कि उनकी शिष्याओं में कई लखनऊ विश्वविद्यालय व अन्य कॉलेजों में विभागाध्यक्ष रहीं तो कई प्रशासनिक सेवाओं व अन्य ऊंचे पदों तक पहुंचीं। कहती हैं कि लखनऊ से दूर हूं लेकिन वहां की यादें आज भी मन में संजोकर रखी हैं।
मृगतृष्णा, बिखरी पंखुरियां (काव्य संग्रह), प्रवासिनी केबोल काव्य संग्रह में कविताएं, सुधियों की लहरें (संस्मरण एवं लेख), विविधा (रोचक ललित निबंध), आंचल की छांव में (मां के संस्मरण), संस्कृत में वैदिक सूक्त : कस्मै देवाय हविषा विधेम, नासदीय सूक्त और विदेशेषु देववाणी संस्कृतम्।
ये मिले सम्मान व पुरस्कार
- अंतरराष्ट्रीय मंचीय कविता सम्मेलन, लखनऊ में राज्यपाल द्वारा सम्मान। (2014)
- हिंदी दिवस पर कौंसिल जनरल, कौंसलावास सैनफ्रांसिस्को द्वारा सम्मानित। (2018)
- अटल पत्रकारिता सम्मान (2018)
- मॉरिशस हिंदी सभा की ओर से यात्रा संस्मरण पर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार (2019)
उपलब्धियां
- आकाशवाणी और दूरदर्शन (लखनऊ) में 1992 तक वार्ताओं, कविताओं व गीतों का प्रसारण।
- अमेरिका की प्रमुख हिंदी व संस्कृत से संबद्ध संस्था विश्व हिंदी ज्योति केअलावा संस्कृत भारती के कार्यक्रमों में प्रतिभाग।
- अमेरिका और भारत की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेखों व कविताओं का प्रकाशन।