फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हाइकोर्ट की टिप्पणी: बदला लेने के लिए हो रहा है दहेज कानून का इस्तेमाल

Fri, 06 May 2016 02:36 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
विज्ञापन
डेमो
विज्ञापन
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का कहना है कि दहेज की मांग रोकने के लिए आईपीसी में सेक्शन 498-ए का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसके दुरुपयोग के मामले सामने आ रहे हैं। 
विज्ञापन


इसका उपयोग किसी से बदला लेने के लिए किया जा रहा है तो कई दफा छिपे हुए मकसद साधने के लिए दूसरे पक्ष को दबाव में लाने में भी हो रहा है। 

राजधानी के केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई) के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक डॉ. बिजॉय कुंडू पर उनकी पत्नी पियु द्वारा दहेज के लिए प्रताड़ित करने और धोखेबाजी के आरोपों पर दर्ज एफआईआर खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने गुरुवार को यह बातें कहीं। 

डॉ. कुंडू की शादी 1986 में हुई थी और उनकी पत्नी ने 2012 में तलाक के लिए अर्जी दी थी, अदालत ने इतने समय बाद दहेज मांगे जाने की बात को बेहद असंभव बताया।
विज्ञापन


सीडीआरआई की मेडिशनल कैमिस्ट्री डिवीजन से रिटायर्ड डॉ. कुंडू के खिलाफ लखनऊ की अदालत ने इस मामले में जुलाई 2013 को समन जारी किया था। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में प्रार्थनापत्र दिया था।

इस पर अपने निर्णय में हाईकोर्ट के जस्टिस महेंद्र दयाल ने कहा कि सामने आए तथ्यों के विश्लेषण से शादी के इतने वर्ष बाद दहेज की मांग और इसके लिए उत्पीड़न का आरोप लगाया गया है। यह आरोप न तो साबित किए जा सके हैं, न ही संभव लगते हैं। 

डॉ. कुंडू मेट्रो सिटी में पत्नी पियु से अलग रहने लगे हैं। उन पर लगाए गए आरोपों से यह भी साबित नहीं हो पाया है कि वे दहेज की मांग कर रहे थे। 

शादी के ‌इतने सालों बाद आरोप लगाना दुर्भाग्यपूर्ण

डेमो
कोई भी अपराध साबित नहीं होता है, फिर भी डॉ. कुंडू को मजिस्ट्रेट द्वारा समन किया जाना त्रुटिपूर्ण था। ऐसे में आदेश को रद्द किया जाना चाहिए। इसे रद्द करते हुए उन पर दर्ज एफआईआर और समस्त कानूनी कार्रवाई को खारिज किया जाता है।

हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए समन आदेश पर कहा कि इन्हें तकनीकी रूप से चलते जारी किए गया। प्रथम दृष्ट्या में आरोप सही हैं या नहीं, यह भी देखा नहीं गया। यह गलत है।

अपने आदेश में जस्टिस दयाल ने दोनों पक्षों से कहा कि दोनों पक्ष सम्मानित परिवारों से हैं और डॉ. कुंडू एक ऊंचे पद पर हैं। शादी के इतने वर्षों बाद और दो बेटे होने के बाद भी दोनों पक्षों का इस तरह से कानूनी विवादों में पड़ना और एक दूसरे पर इस तरह से आरोप लगाना दुर्भाग्यपूर्ण है।

अदालत में डॉ. कुंडू ने बताया कि नवंबर 1986 में शादी के बाद उन्हें अपनी पत्नी पियु से दो बेटे हुए, जिनमें से एक कंप्यूटर इंजीनियर है, दूसरा 20 वर्ष का है। 1989 से 91 के दौरान डॉ. कुंडू अमेरिका गए, इस दौरान अपनी पत्नी को एमबीए करने के लिए उन्होंने प्रेरित किया। 

वहीं कई देशों की यात्राएं भी उसके साथ की। लेकिन पत्नी ने हमेशा उनकी उपेक्षा की और कई दफा उन्हें नाजायज औलाद बताते हुए अपशब्द कहे। इन सब से तंग आकर मार्च 2012 में डॉ. कुंडू ने अपना घर छोड़ दिया और अलग रहने लगे।
विज्ञापन

अदालत ने तय किया 15 हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ता

डेमो
उनकी पत्नी ने दहेज के लिए अर्जी दी और इसका आधार पति द्वारा क्रूरता बरतना और उसे अकेला छोड़ दिया जाना बताया। पति पर घरेलू हिंसा का केस भी दर्ज कराया और गुजारे भत्ते का दावा किया।

जिस पर अदालत ने अंतरिम रूप से 15 हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ता तय किया। इस पर डॉ. कुंडू ने पत्नी को 1.70 लाख रुपये अदा किए। डॉ. कुंडू का कहना है कि उन पर दहेज रोकथाम कानून, पीड़ित करने और धोखेबाजी के झूठे आरोप लगाए गए। 

इन आरोपों पर लखनऊ के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मशीनी ढंग से निर्णय करते हुए उन्हें समन कर दिया। इन्हें खारिज करते हुए समन को खत्म किया जाना चाहिए।

दूसरी ओर उनकी पत्नी पियु द्वारा जवाबी हलफनामे में अदालत में बताया गया कि सभी आरोप सही हैं। डॉ कुंडू ने उनकी सभी चल अचल संपत्तियों पर कब्जा कर लिया है। 

संपत्तियां बेची हैं और अब उन्हें अकेला छोड़ दिया है। उनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है। अलीगंज सेक्टर एच में दोनों के नाम पर एक 2200 वर्ग फीट का फ्लैट था, जिसे डॉ. कुंडू ने बिना पत्नी की अनुमति व जानकारी के बेच दिया।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें