भले ही सभी पक्षकार सार्वजनिक रूप से कह रहे हों कि श्रीराम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद राजनीतिक नहीं है। पर, सच यही है कि इस विवाद ने आज पूरी तरह राजनीति को प्रभावित कर रखा है। अगर यह कहा जाए कि इस मुद्दे का पूरी तरह राजनीतिकरण हो चुका है तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसलिए भी इस मामले का फैसला बहुत सरल नहीं रह गया है।
पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीशों की शैली को लेकर जिस तरह उथल-पुथल रही और वामपंथी एवं आजम खां जैसे नेता जैसी बातें कर रहे हैं उसके चलते भी कई लोगों को इस विवाद का समाधान अदालती फैसले से होना बहुत आसान नजर नहीं आता। जाहिर है कि देश की सर्वोच्च अदालत इस विवाद में निर्णय सुनाती है तो ऐतिहासिक होगा।
इसलिए ऐतिहासिक
ऐतिहासिक इन संदर्भों में कि इससे समाधान की तरफ बढ़ने में मदद मिलेगी। साथ ही इस फैसले के बाद कम से कम न्यायालय के विकल्प पर विराम लग जाएगा। फैसला कुछ भी आए लेकिन केंद्र सरकार को तटस्थ भूमिका से निकलकर विवाद के हल के बारे में सक्रियता से सोचना होगा। यही नहीं, इतने जटिल धार्मिक विवाद का हल कहीं न्यायालय के फैसले से निकल आया हो इसका कोई स्पष्ट उदाहरण इतिहास के पन्नों में नजर नहीं आता।
सुनवाई के चलते अयोध्या और श्रीराम मंदिर मुद्दा देश और प्रदेश के सियासी पारे को भी चढ़ाएगा। खास तौर से उत्तर प्रदेश में इस मुद्दे पर जबर्दस्त राजनीतिक हलचल रहने की उम्मीद है। कारण, राजनीतिक दल किसी न किसी बहाने इस मुद्दे को धार देकर सियासी समीकरणों को अपने पक्ष में दुरुस्त करने की कोशिश जरूर करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या होगा और उसे सभी पक्ष स्वीकार करेंगे या नहीं, यह तो भविष्य में पता चलेगा लेकिन अगले कुछ दिनों तक यह मुद्दा सड़क से लेकर सदन तक छाया रहेगा, इसमें दो राय नहीं है। एक तो संयोग से जिस दिन सुनवाई शुरू हो रही है उसी दिन प्रदेश में विधान मंडल सत्र शुरू हो रहा है। दिल्ली में संसद का सत्र चल ही रहा है। स्वाभाविक रूप से सदनों में भी यह मामला किसी न किसी रूप में जरूर गूंजेगा।