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UP: हाईकोर्ट ने दिया आदेश- संविदा के विशेष शिक्षकों को वेतन समानता और परिणामी सेवा लाभ प्रदान करे सरकार

Tue, 11 Aug 2026 09:48 PM IST
Ishwar Ashish Bhartiya अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ

सार

पीठ ने फैसला सुनाया कि राज्य शिक्षकों की सेवा शर्तों की अनदेखी करते हुए योजना के लाभों का फायदा उठाकर चुनिंदा रूप से इसे लागू नहीं कर सकता है। कोर्ट ने अधिकारियों को इन निर्देशों का पालन करने के लिए चार महीने का समय दिया है।
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- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सरकारी स्कूलों में कई वर्षों के अनुबंध पर कार्यरत विशेष शिक्षकों/संसाधन शिक्षकों को वेतन समानता और परिणामी सेवा लाभ प्रदान करें। अदालत ने फैसले में कहा कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को शिक्षित करने के लिए नियुक्त किए गए शिक्षकों की संविदात्मक स्थिति का उपयोग उन्हें उन लाभों से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता है जो संबंधित नियमित शिक्षकों को उपलब्ध हैं। कोर्ट ने अधिकारियों को इन निर्देशों का पालन करने के लिए चार महीने का समय दिया है।

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न्यायमूर्ति इरशाद अली की एकल पीठ ने यह फैसला याचिकाकर्ताओं, विपिन मिश्रा और 23 अन्य लोगों द्वारा दायर एक याचिका को स्वीकार करके दिया। याचियों ने नियमित शिक्षकों के समान लाभ प्रदान करने का आग्रह किया था। याचियों को जिला स्तरीय चयन समितियों और सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से भ्रमणशील शिक्षकों और संसाधन शिक्षकों के रूप में नियुक्त किया गया था। यद्यपि उनकी नियुक्तियों को संविदात्मक बताया गया था और उनका प्रारंभिक पारिश्रमिक 6,000 रुपये प्रति माह निर्धारित किया गया था।

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि उन्होंने नियमित विशेष शिक्षकों के समान कर्तव्यों का निर्वहन किया। कहा कि वे सरकारी स्कूलों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को शिक्षा प्रदान करने और उनका आकलन, पुनर्वास, परामर्श और निरंतर निगरानी करने का काम करते थे। कहा कि उनके पास भारतीय पुनर्वास परिषद द्वारा निर्धारित योग्यताएं हैं और उन्होंने अपने संविदात्मक समझौतों के लगातार नवीनीकरण के माध्यम से कई वर्षों तक काम किया है।
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यह विवाद इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि वर्षों तक विशेषीकृत शैक्षिक कर्तव्यों का निर्वाह करने के बावजूद, याचिकाकर्ताओं को केवल एक निश्चित मानदेय का भुगतान किया जाता था, जबकि समान कार्य करने वाले नियमित शिक्षकों को नियमित वेतनमान और सेवा लाभ प्राप्त होते थे। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि समानता से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत भेदभाव के बराबर है।

पीठ ने फैसला सुनाया कि राज्य शिक्षकों की सेवा शर्तों की अनदेखी करते हुए योजना के लाभों का फायदा उठाकर चुनिंदा रूप से इसे लागू नहीं कर सकता है। अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ताओं को आकस्मिक या छिटपुट आधार पर नियुक्त नहीं किया गया था, और उन्होंने वर्षों तक बिना किसी रुकावट के काम किया था। इसमें कहा गया कि केवल उनकी नियुक्तियों को संविदात्मक बताना संवैधानिक गारंटियों को विफल नहीं कर सकता, जब उनके पास आवश्यक योग्यताएं हों और वे संबंधित विशेष शिक्षकों के समान कर्तव्यों का निर्वहन करते हों।

अदालत ने राज्य के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि कुछ याचिकाकर्ताओं ने बाद में नई नियुक्तियां स्वीकार कर ली थीं और इसलिए उनके पहले के दावे निष्फल हो गए थे। पीठ ने कहा कि बाद की नियुक्तियां उन अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकतीं जो पिछली योजना के तहत सेवा की अवधि के दौरान पहले ही अर्जित हो चुके थे। याची शिक्षकों ने हाईकोर्ट का रुख तभी किया जब अधिकारियों के समक्ष बार-बार किए गए उनके प्रयासों के बावजूद उन्हें वेतन समानता प्राप्त नहीं हुई। याचिका को स्वीकार करते हुए, न्यायालय ने राज्य सरकार समेत प्रतिवादियों को याचिकाकर्ताओं को वेतनमान में समानता और आईईडीसी योजना के खंड 12.3 के तहत सभी परिणामी सेवा लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया, जिसमें वार्षिक वेतन वृद्धि, स्वीकार्य अवकाश लाभ, जहां भी लागू हो मातृत्व लाभ और सेवा की निरंतरता शामिल है।

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