कांग्रेस नेता इमरान मसूद का टुकड़े-टुकड़े काट देने वाला बयान हो या फिर आजम खां का कारगिल जीत को लेकर फौजियों की भूमिका वाला या फिर अमित शाह का अपमान का बदला लेने वाला भाषण।
सब के सब न केवल मीडिया से लेकर मतदाता तक का ध्यान खींचते हैं बल्कि इस पर गौर करने को मजबूर करते हैं कि आखिर वह क्या बात है कि आम दिनों में शीरी जुबान में सबको खुश करने वाली बात करने वाले राजनेताओं को चुनाव के दौरान आखिर क्या हो जाता है कि वे बदजुबान हो जाते हैं।
क्या है इसका मूल कारण? ऐसा सायास होता है या फिर बेसाख्ता निकल जाते हैं ये तल्ख शब्द? आखिर क्या फायदा होता है इन राजनेताओं को इस तल्ख जुबानी से?
हो जाते हैं मशहूर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का चुनावी दौरा कर लौटे एक पत्रकार का कहना था कि फायदा तो होता ही है।
वे बताते हैं कि कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद चुनावी दौड़ में काफी पीछे चल रहे थे, पर तल्ख जुबानी के कारण जेल जाने के बाद उनके ग्राफ में अप्रत्याशित उभार आया है।
लोग वोट दें न दें, पर सहारनपुर की हर दुकान, गांव में उनके नाम की चर्चा थी। कुछ ऐसा ही भाजपा के यूपी प्रभारी अमित शाह के भाषण को लेकर हुआ।
समाजशास्त्री डॉ. राजेश मिश्रा कहते हैं कि जैसा समाज होता है, राजनीति भी उसी रास्ते पर चलती है।
धर्म और जाति के आधार पर बंट जाते हैं लोग
दरअसल भारत का समाज जातीय व सांप्रदायिक आधार पर बेहद विभाजित व ध्रुवीकृत है। वैसे भी लोकतंत्र अपरिहार्य तौर से समाज को समूहों में विभाजित करता है।
ऐसे समाज में किसी के लिए मतदाताओं की सहानुभूति हासिल करने का आसान रास्ता होता है कि वह धर्म और जाति के आधार पर दुश्मन पैदा करे।
भारतीय समाज और लोकतंत्र की इस कमजोर कड़ी का फायदा उठाकर कई लोग बड़े राजनेता बने। स्वाभाविक है अन्य लोग भी उस आसान रास्ते पर चलने के लिए तत्पर होंगे।
चुनावी राजनीति से 12 साल से दूर समाजवादी नेता शतरुद्र प्रकाश कहते हैं, यह ट्रेंड मंडल-मंदिर आंदोलन के बाद उभरा।
पहले तो किसी को किसी विरोधी की आलोचना करनी होती थी तो इतना कहना ही काफी होता था कि आदमी तो अच्छे हैं, पर गलत पार्टी में हैं।
वक्त के साथ आलोचना में आती गई तल्खी
पुराने समय में अगर किसी पार्टी के नेता को किसी दूसरी पार्टी के नेता को विकास के नाम पर घेरना होता तो धीरे से बयान दे देते थे-चाहते तो काम कर सकते थे पर किया नहीं।
दरअसल मंडल-मंदिर आंदोलन ने समाज में जाति और धर्म के आधार पर सहिष्णुता कम की। असहिष्णु समाज में ही तल्खी को जगह मिल सकती थी।
राजनीति में वैचारिक संकट और ज्वलंत सवालों के प्रति राजनेताओं की प्रतिबद्धता में कमी से भी जुबानी जंग ने तेजी पकड़ी है और यह वक्त ही बताएगा कि आने वाले दिनों में राजनीति का स्तर कितना गिरता है।
राजनीतिक दुश्मन से आसान होती है कामयाबी की राह
जीबी पंत इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के डॉ. बद्रीनारायण का कहना है कि तल्ख जुबानी नेताओं का सोचा-समझा प्रयास होता है।
उनकी कोशिश होती है कि इसके जरिए समाज के एक हिस्से को अपने पक्ष में कर लिया जाए और वोट बटोरा जाए।
वहीं बीएचयू के प्रोफेसर अशोक कौल का मानना है कि व्यावहारिक तौर पर लोकतंत्र में किसी व्यक्ति या शख्स की कामयाबी के लिए जरूरी होता है कि उसके पास एक अदद राजनीतिक दुश्मन भी हो। उनका मानना है कि भारत में शिक्षा का स्तर बेहतर नहीं है, इसलिए ऐसी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।