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गुजरात के बाद अब यूपी में हल्ला बोलेंगे हार्दिक पटेल

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गुजरात में पटेलों और पाटीदारों के लिए आरक्षण की आवाज उठाने वाले हार्दिक पटेल ने लखनऊ में रैली करने का ऐलान कर सूबे में नए सियासी समीकरण की सुगबुगाहट को हवा दे दी है। उनके इस फैसले में सूबे के सभी सियासी दलों को आगाह करने वाले सुर भी छिपे हुए हैं।
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पटेल की रैली के चलते वर्ष 2017 की चुनावी तैयारियों में जुटे राजनीतिक दलों को नए सिरे से अपने समीकरणों की समीक्षा करनी पड़ सकती है। सामान्य तौर पर लोग यह मान सकते हैं कि पटेल लखनऊ में बिगुल बजाकर भाजपा पर दबाव बनाना चाहते हैं कि उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार गुजरात में उनकी मांग मान ले। पर, बात सिर्फ इतनी भर नहीं दिखती।

हार्दिक इसके जरिये राष्ट्रीय स्तर की शख्सियत बनना और सभी राजनीतिक दलों को आरक्षण के मुद्दे पर नए सिरे से विचार-विमर्श के लिए मजबूर करना भी चाहते हैं। इस बीच सत्ताधारी सपा के नेता चौधरी लौटन राम निषाद ने एक बयान जारी कर पाटीदार आरक्षण के बहाने पिछड़ों के आरक्षण को खत्म करने की साजिश बताया है।
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वैसे लोग यह तर्क भी दे रहे हैं कि हार्दिक पटेल जैसे युवा और नौसिखिया चेहरे के लिए उत्तर प्रदेश जैसी जटिल राजनीतिक परिस्थितियों में पैर जमाना आसान नहीं होगा। हार्दिक जिन पटेलों के आरक्षण की आवाज उठा रहे हैं, उत्तर प्रदेश में वे पटेल कुर्मी कहे जाते हैं।

ये पहले से ही पिछड़ों के लिए घोषित 27 प्रतिशत आरक्षण में शामिल हैं। बेनी प्रसाद वर्मा जैसे कुर्मी नेता पहले से ही यहां मौजूद हैं, वहीं अपना दल की पूरी राजनीति ही पटेल या कुर्मी आधारित है। हालांकि राजनीतिक समीक्षकों के निष्कर्ष इससे इतर हैं। इनकी मानें तो हार्दिक का मकसद सिर्फ इतना भर नहीं है। वे इससे बहुत आगे की सोच और उससे निकलने वाले नतीजों को देखकर उत्साहित हैं।

हार्दिक के आंदोलन के पीछे है ये वजह

राजनीति शास्त्री प्रो. एसपीएन त्रिपाठी का तर्क है कि हार्दिक का आंदोलन तो आरक्षण की सुविधा से बाहर वालों को लामबंद करने के लिए है। गुजरात में वे पटेल या पाटीदार की बात उठा रहे हैं तो लखनऊ में जाटों को आरक्षण से बाहर करने के केंद्र के फैसले के खिलाफ आवाज उठाएंगे।

न सिर्फ जाट बल्कि गैर आरक्षित श्रेणी के नौजवानों के दिल और दिमाग में भी आरक्षण से मिलने वाली सुविधाओं की बात बैठाएंगे। उन्हें बताएंगे कि आरक्षण से बाहर होने के कारण किस तरह उनकी उपेक्षा हो रही है।

पर, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वे गैर आरक्षित जातियों के नौजवानों या अन्य लोगों को आरक्षण पाने के लिए लामबंद करना चाहते हैं। दरअसल, हार्दिक इनको लामबंद करके राजनीतिक दलों को इस बात के लिए विवश कर देना चाहते हैं कि वे नौकरियों से लेकर अन्य तमाम क्षेत्रों में मिल रहे आरक्षण पर पुनर्विचार करें।
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यूपी में ये वर्ग करेंगे हार्दिक का समर्थन

प्रो. त्रिपाठी के तर्कों पर गौर करें तो हार्दिक को उत्तर प्रदेश में उन तमाम वर्गों का समर्थन मिल सकता है जो आरक्षण से बाहर हैं या आरक्षण सूची में शामिल होने के बावजूद इस सुविधा से वंचित हैं। कारण, आरक्षण की भी एक सीमा है।

किसी भी राजनीतिक दल या सरकार के लिए सभी जातियों के लिए आरक्षण का कोटा तय कर देना संभव ही नहीं है। सियासी दलों पर नजर डालें तो हार्दिक सपा, बसपा सहित सभी के लिए समस्या बनेंगे। सपा और बसपा पर जिस तरह आरक्षण का लाभ कुछ जाति विशेष के लोगों को देने के आरोप लगते रहे हैं, उसे देखते हुए इन्हें अपने समीकरणों पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।

सिर्फ आरक्षण देने के आश्वासन से काम नहीं चलेगा बल्कि देकर दिखाना होगा। रही भाजपा की बात तो उसके लिए कई तरह की समस्याएं उत्पन्न होने की आहट सुनाई देने लगी है। गुजरात में स्थितियों को ठीक करने के साथ ही उसे आरक्षण के मुद्दे पर अपनी नीति स्पष्ट करनी होगी।

अगर वह हार्दिक की अनदेखी करती है तो आरक्षण से बाहर वाली जातियां जो आम तौर पर अभी भाजपा की ही समर्थक मानी जा रही हैं, के नाराज होने का खतरा बढ़ेगा। इसकी आहट यूपी के पश्चिमी हिस्सों में अभी से सुनाई भी दे रही है।
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