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यहां गन्ने के जूस में घुली रही सियासत!

Fri, 21 Mar 2014 11:58 AM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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गंगा के दोनों तरफ स्थित बिजनौर संसदीय सीट के समीकरण भी रंग बदलते दिखते हैं। कहीं, मुजफ्फरनगर दंगों के असर की बात सामने आती हैं तो कहीं जनता के मुद्दों की।
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अपने पसंदीदा प्रत्याशी के पक्ष में दलीलें दी जा रही हैं, तर्क-वितर्क हो रहे हैं। मेरठ-बिजनौर मार्ग पर कस्बानुमा गांव है मवाना खुर्द। आम बोलचाल में इसे छोटा मवाना कहा जाता है।

यहां तक पहुंचने के लिए एनएच-74 पर गड्ढों के बीच गाड़ी बहुत धीमी गति से चलती है। छोटा मवाना के बहसूमा बाईपास तिराहे पर बना मार्केट आजकल सियासत का केंद्र बना हुआ है।
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मार्केट के बाहर सवेरे नौ बजे ही कुर्सियों और चारपाई पर बैठे आसपास के गांवों के लोग चुनावी चर्चा में मशगूल मिलते हैं।
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दंगे का असर चुनाव के परिणाम में पता चलेगा

रिटायर्ड फौजी संजीव कुमार शर्मा कहते हैं चुनाव में सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। आप लाखों कमाइये, कोई लूट ले जाए तो क्या करोगे?

तिराहे पर लोहारी का काम करने वाले शहाबुद्दीन कहते हैं कि प्रदेश और केंद्र की हुकूमत से लोग खुश नहीं हैं।

वहीं बैठे नफीस अहमद से राय पूछी जाती है तो वह कहते हैं- ‘नो आर्ग्यूमेंट’। मतलब साफ है, वह बाकी लोगों की राय से इत्तेफाक नहीं रखते हैं और अपनी बात कहने में हिचकिचा रहे हैं।

क्या मोदी को रोकने के लिए मुस्लिमों का ध्रुवीकरण होगा? वे तपाक से कहते हैं, क्यों नहीं हो सकता। किसके पक्ष में? नफीस कहते हैं- सपा, बसपा और कांग्रेस (रालोद) किसी के भी पक्ष में।

चर्चा के बीच पड़ोस के भगवानपुर गांव के नानकचंद आ जाते हैं।

हालांकि नए परिसीमन में उनका गांव मुजफ्फरनगर संसदीय सीट में चला गया है लेकिन वह बिजनौर सीट की राजनीति में पूरी दिलचस्पी रखते हैं। कहते हैं, दंगे का असर रिजल्ट आने पर सामने आ जाएगा।

गांवों में भी जागरूक हुए लोग

परीक्षितगढ़ रोड पर करीब आठ किमी चलने के बाद दाई तरफ अधबनी सड़क पर चार-पांच किमी अंदर दलित और यादव बहुल गाजीपुर गांव में करीब ढाई बजे एक प्रत्याशी की सभा खत्म होती है।

सभास्थल के नजदीक खड़ी दलित महिला मुनेश पूछती हैं, मेरा और मेरे पति सतीश का वोट (वोटर आईडी कार्ड) कैसे बनेगा?

बहनजी (मायावती) के दो वोट कम हो जाएंगे। उनकी पड़ोसन कैलाशो बताती हैं कि पहले बाहर काम करते थे, कुछ दिन पहले ही गांव आए हैं, इसलिए वोट नहीं बन सका है।

गन्ने के जूस में चीनी के साथ राजनीति भी

मवाना शुगर मिल के यार्ड में बुग्गियों की लाइन लगी है। करीब 11 बजे तौल केंद्र पर पहुंचते ही भैंसा गांव के अख्तर, रहमत अली, खेड़ी मनिहार के पंकज, मीवा के भज्जड़, योगेन्द्र सिंह, बोहड़पुर के अमजद खां आदि अपनी पीड़ा बताने लगते हैं।

कहते हैं, हमारा पहला मुद्दा चीनी मिल से बकाया गन्ना मूल्य दिलाने का है। अभी पिछले साल 25 मार्च तक का भुगतान हो रहा है। घरों में जवान बेटियां बैठी हैं, किसान क्रेडिट कार्ड का पैसा जमा कराने को नोटिस मिल रहे हैं।

हर चीज तो नकद मिलती है, कहां से खरीदें। रजबाहों में घास जमी पड़ी है। ऐसी आबपाशी (सिंचाई शुल्क) मुफ्त करने का क्या फायदा, जब रजबाहों में पानी न हो।

रहमत कहते हैं कि अभी उम्मीदवार गांवों में नहीं आ रहे हैं, जब आएंगे तो उनसे सवाल करेंगे। योगेन्द्र कहते हैं, हिंदू-मुस्लिम में बंटकर वोट नहीं डालेंगे। इसी में तो मुद्दे उड़ जाते हैं।

सबका पता है मुजफ्फरनगर दंगा किसने कराया

मवाना के अटौरा रोड पर मुस्लिम बस्ती में शमशाद की चाय की दुकान है। यहां चुनावी चर्चा छिड़ने पर मेराजुद्दीन अंसारी कहते हैं, बिजली की बड़ी समस्या है।

सपा सरकार ने बुनकरों को मुफ्त लाइट देने का वादा किया था। हमें तो बिल देकर भी बिजली नहीं मिल रही है। रोजगार के लिए दो-चार पावरलूम लगा रखी हैं, बिजली रहती नहीं, करें तो क्या करें।

युवा अरशद कहते हैं, रसोई गैस कनेक्शन के लिए चार महीने से चक्कर काट रहा हूं। उमरदीन कहते हैं, कोई भी दल हो, सरकार बनने के बाद पूछता नहीं है। प्रत्याशी आएं तो सहीं, उनके सामने सभी मुद्दे उठाएंगे।

मौसम अली कहते हैं, हमारे पास कोई आएगा क्यों? कई लोग पहले ही ठेकेदारी जो ले लेते हैं।

वह कहते हैं कि यहां भाईचारा कायम है और मुजफ्फरनगर दंगा चुनाव का मुद्दा नहीं है। सभी जानते हैं कि वहां लोग लड़े नहीं, सियासत ने उन्हें लड़ाया।

कांग्रेस नेता बसपा के पैरोकार

करीब चार बजे बहसूमा कस्बे के अनुज टी स्टॉल में अंगूर चंद जाटव और कुछ अन्य लोग बैठकर रोजाना सियासी चर्चा करते हैं।

जाटव बताते हैं कि वे कांग्रेस अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष हैं। उनके भाई हरशरण जाटव हस्तिनापुर क्षेत्र के कांग्रेस के विधायक रह चुके हैं।

वे कांग्रेस-रालोद गठबंधन पर सवालिया निशान लगाते हैं। कहते हैं कि कांग्रेस को रालोद के वोट ट्रांसफर नहीं होते हैं।

वे राजनीति के गुणा-भाग के आधार पर बसपा की जीत का दावा करते हैं। हालांकि टी स्टॉल के संचालक जयपाल सिंह मोदी की लहर का दावा करते हैं।

भाजपा प्रत्याशी का विरोध

मीरापुर कस्बे से करीब चार-पांच किमी दूर कुतुबपुर गांव है। इस गांव के चौधरी वीरेंद्र सिंह भाजपा से टिकट के दावेदार थे।

मुजफ्फरनगर दंगे में 34 दिन जेल में बंद रहे। वे कहते हैं कि यहां एकमात्र मुद्दा मुजफ्फरनगर दंगा है।

हो भी क्यों नहीं, दंगे में जो 13 हिंदू मारे गए, उनमें सात बिजनौर लोकसभा सीट से मीरापुर, पुरकाजी और हस्तिनापुर विधानसभा क्षेत्रों के थे।

दंगों के बाद करीब छह हजार लोगों पर मुकदमे हुए, उनमें 1200 इसी क्षेत्र के हैं। भाजपा ने ऐसे प्रत्याशी को टिकट दे दिया, जिनका अब तक कहीं अता-पता नहीं था।

भाजपा नेतृत्व ने जमीनी सच्चाई जाने बिना प्रत्याशी उतारकर चुनाव में शुरुआती लाभ मिलने का मौका गंवा दिया।

समरपाल सिंह, जसवीर सिंह, अजय प्रधान आदि उनकी बात का समर्थन करते हैं। कहते हैं कि इस स्थिति का फायदा रालोद प्रत्याशी जयाप्रदा को मिल सकता है।

पुतला फूंका फिर भी मोदी पहली पसंद

बिजनौर में शाम को साढ़े सात बजे शक्ति चौराहे पर जमे बाइकर्स युवा भी चुनावी चकल्लस से अछूते नहीं हैं।

जमालपुर पठानी के आशुतोष, अवनीश शर्मा, नई बस्ती के राजू, तिमरपुर के अनुज चौधरी और झालू के विभु उल्टा सवाल करते हैं, बताइये कौन सा दल नौजवानों को रोजगार दिलाएगा?

कौन भ्रष्टाचार मिटाएगा? चर्चा में केजरीवाल का नाम आने पर एक युवक पूछता है 48 दिन में उन्होंने सरकार क्यों छोड़ दी?

आशुतोष और अवनीश रोष जताते हुए कहते हैं कि भाजपा ने भारतेन्द्र सिंह को टिकट क्यों नहीं दिया?

वह बताना नहीं भूलते कि सोमवार को उनके गांव में भाजपा प्रत्याशी का पुतला फूंका गया था। इसके बावजूद अधिकतर युवा मोदी को पसंदीदा बताते हैं।
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ये हैं चुनाव मैदान में

भाजपा से राजेंद्र सिंह, रालोद से जयाप्रदा, सपा से शाहनवाज राणा, बसपा से मलूक नागर और आम आदमी पार्टी से डॉ. गौरव चौहान ताल ठोक रहे हैं।

चुनाव बाद ये नेता कहां मिलेंगे?
बिजनौर में गंगा बैराज पर चाय की चुस्की ले रहे रोहिताश्व सिंह, गुलमेर सिंह और बाबूलाल कहते हैं चुनाव में मुद्दे नहीं भावनाएं हावी हो जाती हैं।

अभी सभी दलों के प्रत्याशी दिखाई दे रहे हैं। चुनाव बाद इन्हें कहां ढूंढेंगे, दिल्ली, मुंबई या सिरसा में?
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