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देश में पहली बारः फेफड़े और अमाशय को अलग कर बचाई जिंदगी

Fri, 13 May 2016 02:00 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ

सार

  • मरीज को खाना खाने के बाद थी खांसी की शिकायत
  • इंडोस्कोपी जांच में पता चला कि आमाशय (पेट) में है छेद
  • सर्जरी से पहले दो महीने तक दिया गया नली के जरिए तरल और सेमी सॉलिड पोषण
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प्रोफेसर आनंद प्रकाश - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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देश में पहली बार पीजीआई के विशेषज्ञों ने गैस्ट्रो ब्रांकियल फिस्चुला सर्जरी करने में सफलता हासिल की है। अभी तक विश्व में इस तरह की केवल 25 सर्जरी की गई हैं। सर्जिकल गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग के प्रो.अशोक कुमार और प्रो.आनंद प्रकाश द्वारा की गई यह सर्जरी विश्व की 26वीं और देश की पहली सर्जरी है। 
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इस सर्जरी में डॉक्टरों ने आपस में जुड़े फेफड़े और आमाशय को अलग कर मरीज को लंबे से आ रही खांसी की बीमारी से निजात दिलाई। सर्जिकल गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग के सर्जन प्रो.आनंद प्रकाश ने बताया कि गोरखपुर निवासी शालिनी (19) को खाना खाने के बाद खांसी की शिकायत थी। कई डॉक्टरों को दिखाया पर फायदा नहीं हुआ।

इस पर उसे गोरखपुर से पीजीआई रेफर किया गया। इंडोस्कोपी जांच में पता चला कि आमाशय (पेट) में छेद है। इसके बाद खांसी का कारण जानने के लिए फेफड़ों की ब्रांकोस्कोपी की गई। इसमें पता चला कि फेफड़ों में भोजन के कण हैं। दोनों रिपोर्ट के आधार पर आशंका जताई गई आमाशय और फेफड़े आपस में जुड़े हैं। 
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इसी कारण खाना खाने के बाद जैसे ही भोजन के कण फेफड़े में जाते हैं शालिनी को खांसी आती है। आमाशय और फेफड़े कहां से जुड़े हैं, इसका पता लगाने के लिए मरीज की बेरियम जांच कराने का फैसला लिया गया। इस जांच में एक डाई मरीज को पिलायी जाती है, इसके बाद उसका एक्स-रे लिया जाता है।
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खांसी से परेशान होकर भोजन कर दिया था बंद

अमाशय - फोटो : amar ujala
जहां-जहां डाई जाती है उसका एक्स-रे से पता चल जाता है। इस जांच में पता चला कि आमाशय और फेफड़े आपस में जुड़े हैं। इसी वजह से पेट में खाना जाने के बाद उसका कुछ अंश फेफड़ों में भी चला जाता है। इसी से शालिनी को खांसी आती थी। खाना खाने के तुरंत बाद खांसी आने से परेशान होकर शालिनी ने भोजन बंदकर दिया था और वह बहुत कमजोर हो गई थी। 

जांच के बाद जब उसकी सर्जरी की तैयारी हुई तो शारीरिक कमजोरी आड़े आ गई। दो महीने तक उसे नली के जरिए तरल और सेमी सॉलिड पोषण दिया गया, जिससे उसके शरीर का वजन बढ़ सके। प्रो. आनंद प्रकाश ने बताया कि शालिनी को गैस्ट्रो ब्रांकियल फिस्चुला पैदाइशी नहीं था। वह पहले से ही ऑटी इम्यून डिजीज हेनाक्स परप्यूरा से पीड़ित थी।

इस बीमारी में मरीज के शरीर में प्लेटलेट्स कम हो जाते हैं। ऑटो इम्यून डिजीज के इलाज के लिए उसे विशेष दवाएं लेनी पड़ती थीं। आशंका व्यक्त की जा रही है कि ये फिस्चुला इन्हीं दवाओं के कारण बना होगा। प्रो. आनंद प्रकाश ने बताया कि शालिनी की दिक्कत ऐसी की थी कि लैप्रोस्कोपिक सर्जरी से उसे ठीक नहीं किया जा सकता था।

ऑपरेशन के समय जब उसका पेट खोला गया तो उसका लिवर, स्प्लीन (तिल्ली) आमाशय और पेट को अलग-अलग हिस्सों में बांटने वाली झिल्ली डायाफ्राम से चिपके थी। पहले इन अंगों को अलग किया गया। इसके बाद आमाशय और फेफड़े को जोड़ने वाले रास्ते को बंद किया गया। प्रो. आनंद प्रकाश, प्रो. अशोक कुमार, डॉ. अभिषेक, डॉ. संदीप, डॉ. पियूष, सिस्टर रजनी सर्जरी में शामिल थी। 
 
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