प्रदेश के शहरी थानों को हर महीने रूटीन खर्च के लिए कम से कम 50 हजार रुपये और ग्रामीण थानों के लिए कम से कम 25 हजार रुपये की जरूरत होती है, लेकिन हर महीने की कौन कहे, साल में भी इतनी रकम यूपी के थानों को नहीं मिलती।
एडीजी तकनीकी सेवा आशुतोष पांडेय ने पुलिस वीक के दौरान बृहस्पतिवार को वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को यह आईना दिखाया। प्रस्तुतीकरण के जरिए उन्होंने बताया कि प्रदेश के शहरी क्षेत्र में थानों पर हर महीने जितना खर्च होता है, उतना पैसा थानों को पूरे साल में नहीं मिल पाता।
वहीं, आंध्र प्रदेश में शहरी क्षेत्र के थाने को हर महीने रूटीन खर्च के लिए 50 हजार रुपये और ग्रामीण क्षेत्र के थानों को 25 हजार रुपये मिलते हैं। पुलिस कमिश्नर वाले दो महानगरों हैदराबाद और साइबराबाद थाने में कानून-व्यवस्था के लिए 75 हजार रुपये, ट्रैफिक पुलिस स्टेशन के लिए 25 हजार रुपये और महिला थानों के लिए 50 हजार रुपये हर महीने दिए जाते हैं।
उत्तर प्रदेश में राजधानी लखनऊ के गाजीपुर और गुडंबा थाने को पूरे साल में 40-40 हजार रुपये महकमे की ओर से मिले, जबकि इंदिरानगर थाने को मात्र 20 हजार रुपये ही दिए गए।
यह रकम भी थानों में सफेदी कराने के नाम पर दी गई। थानों को हर महीने रूटीन खर्च मसलन, जांच के लिए दूसरे जिलों में पुलिस की टीमों को जाने के लिए, बैठक कराने के लिए, काउंटर एफिडेविट फाइल कराने के लिए और अचानक खराब होने वाले उपकरणों को सही कराने के अलावा गंभीर दुर्घटनाएं, राहत बचाव कार्य, कम्युनिटी पुलिसिंग, पुलिस की छवि सुधार और अन्य विषम परिस्थितियों के लिए फंड की जरूरत पड़ती है।
ये जरूरतें जब सरकार या विभाग की ओर से पूरी नहीं हो पातीं तो थाना प्रभारी दूसरे तरीकों से इसकी पूर्ति करता है। उन्होंने कहा कि जो व्यवस्था आंध्र प्रदेश में लागू है, उसे यूपी में भी लागू करने की जरूरत है।