गन्ना-चीनी समेत कई महकमों में रह चुके एक नौकरशाह आजकल बिजलीघरों को चलवाने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यहां वे अपना हुनर नहीं दिखा पा रहे हैं।
जब से आए हैं, बिजलीघरों की हालत खस्ता होती जा रही है। कभी कोई यूनिट बंद तो कभी कोई। साहब को यह सब देखने की फुर्सत ही नहीं है? पिछले दिनों से जब बिजली को लेकर हाहाकार मचा तो उन्हें भी अपनी कुर्सी डोलती नजर आई।
किसी तरह अपने सीनियर से मनुहार करके कुर्सी तो बचा ली लेकिन बिजलीघरों की हालत नहीं सुधार पाए। ‘सरकार’ उनके रवैये पर सख्त हुई तो प्रमुख सचिव ने ऐलान कर दिया कि सबसे बड़े बिजलीघर की जो यूनिट बंद है, उसे दुरुस्त कराने की प्रगति देखने वे खुद मौके पर जाएंगे।
बड़े साहब के मौके पर जाने पर पोल खुलने के डर से साहब ने उनसे पहले चक्कर लगा लेना ठीक समझा ताकि ‘सरकार’ तक यह संदेश न पहुंचे कि वे कभी वहां गए ही नहीं।
बेमन से लखनऊ से रवाना हुए। सुबह जैसे ही साहब ने बिजलीघर में कदम रखा, दूसरी यूनिट भी बंद हो गई और सूबे में फिर बिजली के लिए हाहाकार मच गया।
साहब के सामने तो कोई कुछ नहीं बोला, लेकिन पीठ पीछे चुटकी जरूर ली जा रही है कि साहब पहली बार पहुंचे थे, इसलिए उन्हें सलामी ठीक-ठाक मिल गई। अब बिजली का क्या? बड़े-बड़े ‘झटका’ खा जाते हैं। आगे-आगे देखिए होता है क्या?