पिछले साल उद्यमी महासम्मेलन में उद्यमी नेता बोलते-बोलते कुछ ज्यादा ही जज्बाती हो गए थे। तमाम ऐसी बातें कह गए जिससे मंच को भी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा।
उसका खामियाजा बाद में कई अधिकारियों को भुगतना पड़ा था। शायद यही वजह थी कि आयोजक इस बार कुछ ज्यादा ही सजग नजर आए।
इस बार वक्ताओं को कुछ भी मन से बोलने का मौका नहीं मिला। अध्यक्ष तक को अपना भाषण लिखकर पढ़ना पड़ा। दूसरा, मंच के अलावा सामने से किसी को उद्घाटन सत्र में बोलने का मौका नहीं मिला।
पुराने नेता भी कसमसाकर रह गए। मंच संचालक ने थोड़ा मुखर होने की कोशिश की तो विभागीय मंत्री ने उद्योग संगठनों में ही एकता की कमी पर चोट कर उनका तेवर कुंद कर दिया। मंत्री के भाषण के बाद उनकी भाषा भी काफी हद तक बदल गई।