नतीजों में इन सवालों के जवाब छिपे होने की वजहें है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि उपचुनाव में मतदाताओं का रुख आमतौर पर सरकार के पक्ष में रहता है ताकि उनके क्षेत्र में शुरू कराए गए विकास कार्यों की गति न थमे। इसका उदाहरण लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा के उपचुनाव रहे हैं।
भाजपा ने लोकसभा चुनाव में प्रदेश में गठबंधन के साथ 73 सीटें जीतीं थीं। साथ ही प्रदेश में विधानसभा की लगभग साढ़े तीन सौ सीटों पर बढ़त हासिल की थी। पर, लोकसभा का चुनाव लड़कर सांसद बने विधायकों के यहां जब विधानसभा उपचुनाव हुए तो ज्यादातर में भाजपा हार गई। कहने का अर्थ यह है कि लोगों ने उस समय प्रदेश में मौजूद अखिलेश यादव सरकार के साथ ही खड़े होना पसंद किया ताकि काम होते रहें।
वैसे भी पिछले चार साल में देश में हुए चुनाव के नतीजे यह बताते हैं कि प्रतीकों की राजनीति करने में महारथ हासिल कर चुके मोदी ने अगड़ों के साथ गरीबी के नाम पर व जातीय स्वाभिमान के नाम पर दलितों तथा पिछड़ों को भी अच्छी संख्या में अपने साथ भरोसे से जोड़ा है। इसका प्रमाण प्रदेश में लोकसभा की सुरक्षित सभी 17 सीटों और विधानसभा की सुरक्षित 86 सीटों में 76 पर भाजपा की जीत है। इस आधार पर भी समीकरण भाजपा के पक्ष में है। इसलिए इन चुनाव के नतीजे 2019 के आम चुनाव के राजनीतिक रुझान का संकेत भी होंगे।
वैसे तो बसपा का समर्थन मिलने के बाद दोनों ही जगह सपा के प्रत्याशी की गाड़ियों पर बसपा के भी झंडे लग गए हैं और दावा किया जा रहा है कि बसपा के स्थानीय कार्यकर्ता सपा के लिए वोट मांग रहे हैं। लेकिन, जिस तरह पिछले कुछ वर्षों में दलितों व पिछड़ों की गोलबंदी भाजपा के साथ मजबूत नजर आ रही है, उसे देखते हुए बसपा और सपा के दोस्ती के रिश्ते जमीन पर कोई बड़ा उलट-फेर करने की बहुत उम्मीद नहीं बंधाते।
आमतौर पर देखा गया है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रभाव जितना खुद उसके चुनाव में होने पर दिखता है उतना चुनाव से बाहर रहने पर नहीं दिखता। बावजूद इसके यह तो पता चलेगा ही कि इस तरह का प्रयोग दलितों और पिछड़ों को किस हद तक एक साथ लाता है। जहां तक मुस्लिमों के मन की बात है तो गोरखपुर और फूलपुर के समीकरण अलग-अलग हैं। फूलपुर में बाहुबली अतीक अहमद का मजबूती से लड़ना जहां सपा के लिए चुनौती बना है तो कांग्रेस के ब्राह्मण प्रत्याशी का मैदान में होने से भाजपा की चुनौती थोड़ी बढ़ी है।
यह नतीजा बताएगा कि ब्राह्मणों का झुकाव स्वाभाविक रूप से भाजपा की तरफ ही रहता है या वह अपने स्वजातीय कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में भी कुछ झुकता है। लेकिन, लगता नहीं कि बसपा के साथ के बावजूद सपा फूलपुर में भाजपा के साथ सीधी लड़ाई में रहेगी। वहीं, गोरखपुर में सपा का निषाद प्रत्याशी होने के बावजूद अति पिछड़ी जातियों का गोरक्षपीठ से लंबे समय से लगाव रहा है। पीठ की पहचान हिंदुत्व से जुड़ी होने के कारण भी लगभग पूरे ही हिंदू समाज का पीठ को साथ मिलता रहा है। पर, लंबे समय बाद पहली बार भाजपा का उम्मीदवार पीठ से बाहर का कोई व्यक्ति है।
ऐसे में यह बात देखने वाली होगी कि लोगों का समर्थन भाजपा उम्मीदवार को वैसे ही मिलता है जैसा खुद योगी के रहते मिला करता था। सपा की बात करें तो यहां कांग्रेस से मुस्लिम उम्मीदवार होना भी उसके समीकरणों पर कुछ असर डाल सकता है। कुल मिलाकर दोनों जगह के नतीजे सिर्फ जीत या हार नहीं बल्कि आगे के राजनीतिक समीकरणों का भी संकेत देंगे।