फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'गांधी गढ़' जीता, पर बदल गया 'पावर सेंटर'

Sat, 17 May 2014 01:31 PM IST
विवेक गुप्ता/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी हार के बाद माना जा रहा है कि देश से एक परिवार की सत्ता का साया हट गया है लेकिन इसके बावजूद 'गांधी परिवार' हारा नहीं है।
विज्ञापन


सोलह तारीख को सुबह से सोलहवीं लोकसभा के चुनावों के मतों की गिनती शुरू हुई तो तस्वीर कुछ वैसी ही थी जैसे कयास लगाए जा रहे थे।

पूरे भारत में भाजपा ने बढ़त बनाते हुए बहुमत हासिल किया। भाजपा की जीत को शानदार बनाया उत्तर प्रदेश ने जहां भाजपा ने 71 सीटों पर जीत हासिल की।

देश के इस सबसे बड़े सूबे की खासियत यह है कि देश की राजनीति में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाला गांधी परिवार यहीं से सियासत करता है।

राहुल को करना पड़ा संघर्ष

हालांकि यह बात और है कि इंदिरा गांधी की विरासत आज दो ध्रुवों में बंटी हुई है। जहां एक तरफ तो उनकी छोटी बहू और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी हैं।

तो वहीं दूसरी तरफ इंदिरा गांधी की बड़ी बहू और संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी व उनके बेटे वरुण गांधी हैं। सोनिया और राहुल के पास जहां कांग्रेस की कमान है तो मेनका और वरुण के पास भाजपा का साथ हैं।

देश की सियासत में इस मजबूत परिवार का परचम लहराया तो 16वीं लोकसभा में भी पर मोदी लहर के साथ सत्ता बदल गई।

रायबरेली से सोनिया को आसान जीत मिली तो अमेठी में राहुल संघर्ष के बाद जीते। वहीं मेनका और वरुण शानदार जीत के साथ संसद पहुंचे।

रायबरेली में मिली सीधी जीत

गांधी परिवार की रायबरेली सीट ऐसी रही है कि इस सीट पर किसी दूसरी पार्टी के उम्मीदवार की चर्चा भी नहीं हो पाती। कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी यहां से सांसद हैं।

इस सीट पर गांधी परिवार के असर का ही कमाल है कि यूपीए का हाथ देश में दम न दिखा पाया हो पर रायबरेली में सोनिया के हाथ को जनता ने भरपूर साथ दिया।

हालांकि उनकी जीत में अपने क्षेत्र में किए हुए काम और विपक्ष में कोई मजबूत प्रत्याशी न होने का लाभ भी मिला। नतीजतन उन्होंने यहां से शानदार जीत हासिल की।

इन्होंने बढ़ाई थी बेचैनी

उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित सीटों में से एक अमेठी जहां से कांग्रेस के युवराज और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी पारिवारिक सीट को संजो रहे हैं।

यहां पर उन्हें सपा की तरफ से वॉकओवर दिए जाने के बावजूद उनकी राह आसान नहीं थी। आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार कुमार विश्वास ने तो उनके खिलाफ यहां से चार महीने पहले ही ताल ठोक कर चेतावनी दे दी थी तो वहीं भाजपा ने स्मृति ईरानी के रूप में प्रत्याशी उतारकर राहुल का चैन छीन लिया।

राहुल की सीट पर इतना संघर्ष बढ़ गया कि इसका असर उनके दूसरे जिलों में प्रचार अभियान पर भी दिखने लगा था। रही सही कसर नरेंद्र मोदी ने यहां पर चुनाव प्रचार के आखिरी दिन रैली करके पूरी कर दी।

रैली में उमड़े जनसैलाब ने ही इशारा कर दिया था कि राहुल की राह आसान नहीं है। रैली में मोदी ने स्मृति को छोटी बहन कहकर संबोधित किया था, ये एक बहुत बड़ा राजनीतिक दांव था गांधी परिवार में सेंधमारी का, जिसने प्रियंका और राहुल की भाई-बहन की जोड़ी के समानांतर एक रेखा खींच दी।

सुल्तानपुर में वरूण का जलवा

इस सीट से भी गांधी परिवार का ताल्लुक बहुत गहरा है, या यूं कहें कि इस सीट को भी गांधी परिवार की विरासत माना जाता है। शायद इसीलिए गांधी परिवार के दो ध्रुवों सोनिया और मेनका गांधी ने इस सीट पर अपने दावे को बनाए रखने के लिए मजबूत दांव खेला।

कांग्रेस ने जहां नाराज चल रहे निवर्तमान सांसद संजय सिंह को राज्यसभा भेजकर मनाया और उनकी पत्नी अमिता सिंह को प्रत्याशी बनाया तो वहीं मेनका ने पीलीभीत से अपने सांसद बेटे और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव वरुण गांधी को मैदान में उतारकर बड़ा दांव खेला।

मेनका ने अपने पति संजय गांधी का हवाला देते हुए सुलतानपुर की जनता से मार्मिक अपील की कि वह अपना बेटा उन्हें सौंप रही हैं। जाहिर है मेनका का दांव बड़ा था सो जीत भी उन्हें ही मिली।

हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान अमेठी में अपने भाई राहुल गांधी के लिए प्रचार कर रही प्रियंका ने अपने शब्दबाणों से वरुण पर भी निशाना साधा था तो एक मंझे हुए राजनेता के रूप में वरुण के जवाब मेरी चुप्पी को मेरी कमजोरी न समझा जाए के जवाब ने यहां की जनता को उनकी मजूबती का एहसास करा दिया।
विज्ञापन

पीलीभीत से संसद पहुंची मेनका

इंदिरा गांधी का घर छोड़ने के बाद उनकी छोटी बहू मेनका गांधी ने संजय विचार मंच बनाकर अपनी राजनीति की शुरुआत की थी पर उन्हें सफलता नहीं मिली।

हालांकि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बाद में वह निर्दलीय चुनकर संसद पहुंची। उनके बाद उन्होंने भाजपा का दामन थामा और पीलीभीत संसदीय क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया।

यहां से वह सांसद चुनी गईं। 15वीं लोकसभा में उन्होंने यह सीट अपने बेटे वरुण गांधी के लिए छोड़ दी और खुद आंवला संसदीय क्षेत्र से चुनी गईं। 16वीं लोकसभा में जब वरुण सुलतानपुर सीट से चुनाव लड़ने चले गए तो उन्होंने अपनी पुरानी सीट पर फिर दावा ठोक दिया।

पीलीभीत में अपने काम और लोकप्रियता से उनके लिए जीत मुश्किल नहीं थी। इसके अलावा मोदी लहर के असर ने उनकी जीत को और आसान कर दिया। यहां से शानदार जीत हासिल करते हुए 16वीं लोकसभा में उन्होंने प्रवेश कर लिया।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें