लखनऊ। न्यायमूर्ति डॉ. डीके अरोड़ा ने बुधवार को कहा कि बोलने का अधिकार या कोई भी मौलिक अधिकार अपने आप में निरपेक्ष नही है। इन पर कुछ युक्ति-युक्त प्रतिबंध भी लगाए गए हैं। न्यायमूर्ति अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस पर उत्तर प्रदेश मानव अधिकार आयोग की ओर से आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस की इस वर्ष की थीम ''हमारी दैनिक आवश्यकताएं'' है। विशिष्ट अतिथि न्यायमूर्ति सुधीर सक्सेना ने कहा कि गरिमा की शुरुआत अपने घर से होनी चाहिए। समाज में महिलाओं और बच्चियों की गरिमा बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया है।
आयोग के वरिष्ठ सदस्य माननीय न्यायमूर्ति राजीव लोचन मेहरोत्रा ने कहा कि मानवाधिकार चाहे मौलिक हो या विधिक, हमें सुनिश्चत करना होगा। स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार भी मानवाधिकार है। मानवाधिकार की शपथ अपने आप में संपूर्ण है। इसके बाद किसी अन्य कानून की जरूरत नहीं पड़ेगी। मानवाधिकार आयोग के सदस्य बृज भूषण ने कहा कि हमें जो अधिकार मिले हैं, वे मानवाधिकारों की श्रेणी में आते हैं। आयोग के सचिव महोदय संजय कुमार ने स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन आयोग विधि अधिकारी अल्पना शुक्ला ने किया।