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छोटे अफसरों ने कंपनियों के साथ मिलकर किया जमकर खेल, बड़ों की भूमिका पर उठे सवाल

Mon, 01 Oct 2018 12:29 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : डेमो
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मिट्टी जांच के टेंडर में लगातार दो वर्ष से मनमानी होती रही। नीचे के अफसरों ने फर्मों के साथ मिलकर जमकर खेल किया, लेकिन निदेशालय से लेकर शासन तक के बड़े अफसर आंखें बंद किए रहे।
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अब फर्जीवाड़ा कर टेंडर दिए जाने के खुलासे के बाद जिम्मेदार फर्मों व छोटे अफसरों के खिलाफ कार्रवाई के फैसले के बाद बड़े अफसरों की भूमिका पर भी सवाल उठाए जाने लगे हैं।

जानकार बताते हैं कि  ई-प्रोक्योरमेंट गाइडलाइंसके नियमों के मुताबिक एक लाख रुपये से अधिक और 50 लाख तक के भुगतान के लिए कार्यालयाध्यक्ष, अपने विभागाध्यक्ष की अनुमति लेगा। 50 लाख से अधिक के भुगतान के लिए विभागाध्यक्ष को शासन के प्रशासकीय विभाग की अनुमति प्राप्त करनी अनिवार्य है।
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यहां मिट्टी की जांच व विश्लेषण कर रिपोर्ट देने का काम जिन फर्मों को दिया गया, उन्हें दोनों ही वर्ष 50 लाख रुपये से अधिक के भुगतान किए गए हैं। कृषि उत्पादन आयुक्त की जांच रिपोर्ट के मुताबिक मिट्टी जांच का काम करने वाली फर्म यश सॉल्यूशंस को 2017-18 में 6.94 करोड़ और 2018-19 में 19.40 लाख का भुगतान किया गया।
 

कृषि निदेशक से जांच कराने पर भी सवाल

डेमो - फोटो : डेमो
इसी तरह आस्ट्रे सिस्टम को 2017-18 में 4.39 करोड़ का भुगतान किया गया। इस तरह दोनों ही फर्मों को 2017-18 में 50 लाख से अधिक का भुगतान हुआ। नियमानुसार इसके लिए निदेशक  को शासन स्तर तक की सहमति जरूरी थी।

मगर, पड़ताल में खुलासा हुआ है कि मिट्टी जांच के लिए चयनित फर्मों को भुगतान की मंजूरी देने की जिम्मेदारी संयुक्त निदेशक कृषि (शोध एवं रिसर्च) को सौंप दी गई। जांच में भी संयुक्त निदेशक व उनसे निचले स्तर के अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई, वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर गौर नहीं किया गया। मिट्टी जांच के लिए टेंडर के जरिए फर्मों के चयन में गड़बड़ी की शिकायत हुई तो कृषि उत्पादन आयुक्त ने कृषि निदेशक को जांच सौंप दी।

जानकार बताते हैं कि केंद्र से लेकर राज्य तक की कृषि विभाग से जुड़ी योजनाओं का क्रियान्वयन कराने की जिम्मेदारी कृषि निदेशक की होती है। योजनाओं का क्रियान्वयन सही तरीकेसे हो रहा है, यह प्रमुख सचिव व शासन के  अन्य अधिकारी देखते हैं।

ऐसे में निदेशक ने जांच की तो वह अपनी और अपने से वरिष्ठ शासन के अधिकारियों की भूमिका पर गौर कैसे करते? बड़े अफसरों की भूमिका पर गौर न किए जाने से जांच पर ही सवाल उठाए जाने लगे हैं।
 

पीएम की प्राथमिकता की योजना पर भी बड़े अफसरों की बेरुखी

नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों की आय दोगुनी करने की अपनी मुहिम में मिट्टी की जांच कर किसानों में मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरण को अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करते आए हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ किसानों के हित को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता गिनाते रहे हैं। लेकिन प्रदेश सरकार के कृषि विभाग के अफसरों ने सरकार की मंशा को ताक पर रख दिया और पूरी योजना फर्जीवाडे़ की भेंट चढ़ गई। बड़े अफसरों ने इस तरह काम किया, जैसे उनसे कोई मतलब ही न हो। 

घपलों को दबाने का रिकॉर्ड पुराना

fraud shimla
कृषि विभाग में मिट्टी जांच में घपलों को दबाने का रिकॉर्ड पुराना है। सपा शासन में भी आगरा, अलीगढ़, बांदा, बस्ती और हाथरस में घपले पकड़े गए थे। तब विभाग के ही एक अफसर ने अपनी जांच रिपोर्ट में करीब 4.29 करोड़ रुपये के हेरफेर का खुलासा करते हुए पूरे प्रदेश में गहन जांच की सिफारिश की थी।

लेकिन दोषियों के खिलाफ कार्रवाई तो दूर, बाद में उस अफसर को ही हटा दिया गया। पिछले साल प्रदेश में निजाम तो बदला, पर शासन में कृषि विभाग की कमान उन्हीं अफसरों के हाथ में रही। नतीजतन पीएम मोदी के इस ड्रीम प्रोजेक्ट में घपले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।

वर्ष 2015 में अलीगढ़, आगरा, बांदा, बस्ती और हाथरस में उजागर हुए इन मामलों में मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं की जांच से पता चला था कि ज्यादातर मृदा कार्ड अनुमान के आधार पर भर दिए गए थे।

तत्कालीन संयुक्त कृषि निदेशक (शोध एवं मृदा परीक्षण) की जांच रिपोर्ट में इसका भंडाफोड़ हुआ था। कृषि विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत चलाए जा रहे ‘अपनी मिट्टी पहचानें अभियान’ के तहत वर्ष 2013-14 और 2014-15 में 67 लाख से ज्यादा मिट्टी के नमूनों की जांच की गई। जांच में स्थिति एकदम अलग निकली।
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ज्यादातर नमूनों की जांच सिर्फ कागजों पर

- फोटो : डेमो
मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं का मौका मुआयना करने वाले तत्कालीन संयुक्त कृषि निदेशक (शोध एवं मृदा परीक्षण) संतोष अग्निहोत्री ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि नमूनों की सही ढंग से जांच करने के लिए जितनी मात्रा में रसायनों की जरूरत होती है, उतनी मात्रा में खाली बोतलें तक प्रयोगशाला में नहीं मिलीं। मिट्टी की भी उतनी मात्रा वहां नहीं मिली, जितनी कि परीक्षण के बाद होनी चाहिए।

रिपोर्ट में उन्होंने साफ लिखा कि ज्यादातर नमूनों की जांच सिर्फ कागजों में हुई है। इसलिए ऐसे मामलों की और भी गहनता से जांच कराने की जरूरत है। आगरा की एत्मादपुर प्रयोगशाला का जिक्र करते हुए कहा कि इन दो वर्षों में वहां 20 हजार के बजाय दो से ढाई हजार नमूनों की ही जांच की गई। बता दें कि इन दो वर्षों में आगरा को मिट्टी जांच के लिए 1.15 क रोड़ रुपये दिए गए।

इसी तरह की गड़बड़ियां बांदा, बस्ती की तहसील हरैया स्थित प्रयोगशाला और हाथरस की मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में मिली थीं। तब सपा शासन में अमर उजाला से तत्कालीन प्रमुख सचिव, कृषि अमित मोहन प्रसाद ने कहा था-‘मिट्टी की जांच में सामने आए घपलों के बारे में निदेशक, कृषि से बात करूंगा, ताकि पता चल सके कि उनके स्तर से क्या कार्रवाई की गई।’ लेकिन अब तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

'मिट्टी जांच में घपले के ये मामले पुराने हैं। तब मैं निदेशालय में तैनात नहीं था। संयुक्त निदेशक की जांच रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई की गई, इसकी मुझे जानकारी नहीं है।' - सोराज सिंह, कृषि निदेशक
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