एलडीए की मानसरोवर योजना के जिस भूखंड को जाली दस्तावेज और बाबुओं की साठगांठ से बेचा गया। उसमें बैंक के साथ भी जालसाजी की गई है। भूखंड को खरीदने वाले तीसरे व्यक्ति ने पीएनबी हाउसिंग से 49.50 लाख रुपये का लोन लिया और किस्तें ही जमा नहीं कीं। बैंक ने भूखंड पर नोटिस चस्पा किया तो हकीकत सामने आ गई। अब अपर सचिव ज्ञानेंद्र वर्मा ने मामले में दूसरी जाली रजिस्ट्री की जांच का आदेश दिया है।
एलडीए से भूखंड 3/20ए की आवंटी शिल्पी द्विवेदी के पति सुभाष द्विवेदी ने बताया कि इसी साल जनवरी में उनके भूखंड पर बैंक की तरफ से कब्जा लेने के लिए पब्लिक नोटिस लगाया गया। इसके बाद उन्होंने बैंक को बताया कि एलडीए से यह भूखंड उनको आवंटित है। इसका नंबर भी 3/21ए नहीं है। इसके बाद बैंक ने जरूरी जांच के बाद ही लोन देने की बात कहते हुए कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी। इस पर बैंक को अप्रैल में नोटिस भेजकर जवाब दिया गया है कि उनकी जांच और अब तक उनके भूखंड पर की गई कार्रवाई उचित नहीं है।
सुभाष ने खुद भी प्रकरण की अपने स्तर पर जांच की। इसमें पता चला कि एलडीए से कथित रूप से 16 मार्च 2015 को दीप्ति कुमार के पक्ष में रजिस्ट्री हुई। दीप्ति ने 16 मार्च 2017 को विजय कुमार को रजिस्ट्री कर इसे बेच दिया। विजय ने भूखंड 10 अप्रैल 2017 को सौरभ दुलानी को बेच दिया। दुलानी को ही बैंक ने इस भूखंड पर विक्रय अनुबंध के आधार पर लोन दिया।
बैंक की तकनीकी जांच पर भी सवाल
बैंक से जिस तरह से लोन लिया गया। इसके बाद किस्तें जमा नहीं की गईं। यह तरीका बैंक से लोन लेने का फ्रॉड की तरफ ही इशारा करता है। जिस एजेंसी से बैंक ने सत्यापन कराया। उसकी भी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। इसकी वजह यह है कि पांच साल पहले से एलडीए के नियोजन के मुताबिक कॉर्नर भूखंड 3/21 से सटे भूखंड 3/20बी पर आवंटी अपना मकान बनाकर रह रहा है। वहीं इसी के सटे हुए 3/20ए को 3/21ए दिखाकर रजिस्ट्री अनुचित तरीके से की गई। जबकि, जाली ले-आउट प्लान में 3/20बी को भी 3/21बी दिखाया गया है। ऐसे में तकनीकी जांच में बाउंड्री मौके पर अलग ही मिली होती। हालांकि, शिल्पी दुबे को भेजे पत्र में बैंक ने अपनी पूरी जांच प्रक्रिया को सही मानते हुए विधिक कार्रवाई कर भूखंड पर कब्जा लिए जाने को उचित ठहराया है।
अंबी बिष्ट के हस्ताक्षर शुरुआती जांच में जाली
एलडीए के अपर सचिव ज्ञानेंद्र वर्मा ने बताया कि पूर्व उप सचिव व संपत्ति अधिकारी के अंबी बिष्ट के हस्ताक्षर की शुरुआती जांच कराई गई है। रजिस्ट्री पर जो हस्ताक्षर मिले हैं, वह जाली हैं। इसकी पुष्टि योजना देख रहे बाबू ने भी की है। वहीं जिस बाबू आलोक नाथ की आईडी से कंप्यूटर रिकॉर्ड में दीप्ति कुमार का नाम चढ़ाया। यह काम रजिस्ट्री होने के बाद 2018 में किया गया। इसकी भी जांच कराई जा रही है।