वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं पूर्व सांसद निहाल सिंह जैन कहते हैं, पहले राजनीति समाजसेवा का माध्यम थी। अब दिखावा ही ज्यादा है। अब तो चुनाव खर्च काफी बढ़ गया है। हम सब तो ज्यादातर प्रचार पैदल ही करते थे। अस्सी के दशक के बाद से अब तक राजनीति में क्या बदलाव आए, पेश है उन्हीं की जुबानी...
मैं 1980 और 1984 में आगरा का सांसद बना। पहले राजनीति समाजसेवा का माध्यम हुआ करती थी। हम लोग पूरे दिन यही कोशिश करते कि लोगों की समस्याएं हल हो जाएं। विपक्ष भी जनता के मुद्दों पर साथ देता था। पर, अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब तो राजनेताओं की बातों का उतना असर नहीं होता, जितना पहले हुआ करता था। अब तो केवल दिखावा रह गया है। मेरे पिताजी सेठ अचल सिंह व माताजी भगवती देवी स्वाधीनता सेनानी थे। दोनों ने जीवनपर्यंत जनसेवा की।
पिताजी 1952 से 71 तक लगातार पांच बार सांसद चुने गए। पर, कभी गाड़ी पर बत्ती या हूटर पसंद नहीं करते थे। हमने भी कभी नहीं लगवाया। हमने प्रचार के लिए कभी रिक्शा तो कभी ऑटो से ही काम चलाया। ज्यादातर तो पैदल ही चलते थे। अब तो चुनाव बहुत खर्चीला हो गया है। पहले विकास और समस्याओं को लेकर ही चुनाव लड़े और जीते थे। तब कार्यकर्ताओं पर पैसा खर्च नहीं करना करना पड़ता था। कार्यकर्ता विचारधारा से जुड़कर खुद काम करते थे।
मुझसे कई बार लोगों ने कहा कि मंत्री बनने के लिए दिल्ली जाओ, लेकिन क्षेत्र के लोगों से दूर होने का डर सताया। मैं रोज सुबह नौ बजे से लोगों से मिलता था। शाम तक यही सिलसिला चलता था। रोजाना गांव-देहात के सौ-सवा सौ लोगों का खाना बनता था। इसलिए मंत्री बनने का विचार ही त्याग दिया।
... और पिताजी ने हटवा दी नेम प्लेट
पूर्व सांसद निहाल सिंह जैन के बेटे पर्यटन कारोबारी मनोज बोहरा बताते हैं, मैंने पिताजी के सांसद रहते हुए घर पर नेम प्लेट लगवा दी थी। पर, पिताजी ने उसे देखते ही तुरंत हटवाने को कहा। पिताजी ने कहा कि, मुझे नेम प्लेट की जरूरत नहीं है।