उन्होंने कहा कि मैं निर्माण परियोजनाओं में टेंडर से जुड़े काम सक्षम व दक्ष संस्थाओं को देने का पक्षधर रहा हूं ताकि उच्च गुणवत्ता के साथ काम हो। एक विभागीय मंत्री चाहते थे कि टेंडर टुकड़ों-टुकड़ों में ज्यादा से ज्यादा लोगों को दिए जाएं। मंत्री को बताया कि इससे बड़े प्रोजेक्ट की गुणवत्ता में कमी आएगी जिससे सरकार की बड़ी बदनामी होगी। मैंने टेंडर आवंटन की प्रक्रिया इस तरह तैयार कराई कि सभी के लिए समान अवसर हों। मंत्री सहमत हो गए। बाद में आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे, लखनऊ मेट्रो, इकाना स्टेडियम, डायल-100 सहित तमाम प्रोजेक्ट में यह अनुभव काम आया। बेहद कम समय में गुणवत्तापूर्ण उल्लेखनीय काम हो सके।
'फील्ड में कभी किसी मंत्री-सांसद के घर नहीं गया'
कई जिलों का कलेक्टर और कमिश्नर रहा लेकिन कभी भी किसी मंत्री या सांसद के घर नहीं गया। मंत्री, सांसद व विधायक को पूरा प्रोटोकाल व सम्मान मिले, यह सुनिश्चित करता था। यदि मंत्री किसी विशेष प्रकरण पर डीएम से भी चर्चा चाहते थे, तो बाकायदा बुलाते थे। तय समय पर सर्किट हाउस या गेस्ट हाउस जाकर मिलता था। जिले से मंत्री होते थे तो उनके साथ भी यही व्यवहार रहा। सांसद और विधायक समय तय कर आया करते थे। इससे दूसरे राजनीतिक दलों का भी अफसरों पर भरोसा बना रहता है, जो एक कलेक्टर के लिए बहुत जरूरी है।
उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में कई अफसरों के बारे में पता चलता है कि कोई मंत्री जिले में गया तो सुबह से शाम तक उसके साथ हैं। आए दिन कोई न कोई मंत्री जिले में रहते हैं। जिले का मंत्री है तो सुबह-शाम हाजिरी देते हैं। जब देखिए, सांसद के घर पर डटे रहते हैं। ऐसे में जनता के लिए, शासन के निर्देशों पर काम करने के लिए समय कहां मिलेगा? इससे अधिकारी पर राजनीतिक ठप्पा लगता है जिसे कभी उचित नहीं माना जा सकता।
शासन और प्रशासन में राजनीतिक हस्तक्षेप होना स्वाभाविक है। राजनीतिज्ञ जनता से चुनकर आते हैं। जनता उनकी मददगार होती है। ऐसे में राजनीतिक लोग अधिकारी के पास उचित अनुचित सभी तरह के मामले लेकर आ सकते हैं। लेकिन, 90-95 प्रतिशत सही मामले ही लेकर आते हैं। ऐसे में यदि आप उनसे सम्मान से मिलेंगे। उनके सही काम समय से करवाकर बता दें, तो वे संतुष्ट रहेंगे। एक धारणा बन जाएगी कि यह अफसर गलत नहीं करता है। ऐसे में वे आपसे गलत करने को कहेंगे ही नहीं। यदि लोगों के दबाव में आ भी गए तो नियम-कायदे से समझा देंगे कि यह संभव नहीं है, तो मान जाएंगे। अपने लोगों को जाकर समझा लेंगे। राजनीतिक व्यक्ति बहुत समझदार होते हैं। जो झुकने को तैयार होता है, उसी पर गलत करने का दबाव बनाते हैं और जब आप एक बार गलत कर देते हैं, फिर आपका हमेशा झुकना मजबूरी बन जाता है। वे अच्छे व ईमानदार अफसर की कभी खिलाफत नहीं करते। वजह उन्हें पता है कि ऊपर वालों को हर अफसर के बारे में जानकारी है।
'जनता से जुड़ाव सफलता का मूल मंत्र'
किसी अफसर के लिए जनता से जुड़ाव सफलता का मूल मंत्र है। मैंने फील्ड में कलेक्टर से लेकर शासन में कृषि उत्पादन आयुक्त व मुख्य सचिव के पद तक हमेशा जनता से सीधे संवाद किया। जिले में रहा तो विकासखंड स्तर पर 'जनता अदालत' लगवाई। मौके पर ही जनता की सुनकर उनकी समस्याओं का समाधान कराया। बतौर कृषि उत्पादन आयुक्त मंडलीय रबी व खरीफ गोष्ठियों में स्वयं गया और 3-4 घंटे तक किसानों की सुनकर अफसरों से जवाब दिलवाया। उनके फीडबैक पर कार्रवाई की। मुख्य सचिव हुआ तो प्रतिदिन एक घंटे पब्लिक के लिए सुरक्षित रखा। उस समय में प्रदेश के किसी भी हिस्से से कोई भी आकर मिल सकता था। न सिर्फ उनके काम कराता, बल्कि फीडबैक भी लेता था। आज कई अफसर जनता से मिलते तक नहीं।
रंजन ने कहा कि आईएएस अधिकारियों पर स्टेटस-को (यथास्थिति बनाए रखना) बनाए रखने का आरोप लगने लगा है। हर काम में अड़ंगेबाजी, कानूनी दांवपेंच, आंकड़ेबाजी। निर्णय लेने से बचने की कोशिश। इससे काडर की छवि खराब होती है। आईएएस को सबसे बड़ी सेवा मानते हो तो उसी के अनुरूप कार्य करना होगा। आपको ही समस्या का समाधान तलाशना होगा। अड़चन दूर करनी होगी। किस तरह नया काम कर जनता के जीवन को आसान बना सकते हैं इस पर फोकस करना होगा।