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फर्जी अंकपत्र का मामला : हस्ताक्षर मिलान के लिए फॉरेंसिक जांच कराएगी पुलिस

Sun, 25 Aug 2019 03:28 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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लखनऊ विश्वविद्यालय - फोटो : amar ujala
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लखनऊ विश्वविद्यालय के फर्जी अंकपत्र तैयार करने में यहां के जिम्मेदारों की भूमिका फॉरेंसिंक जांच के बाद तय होगी। फर्जी अंकपत्र गिरोह के पास से बरामद फर्जी डिग्री पर लखनऊ विश्वविद्यालय (लविवि) के कर्मचारियों और अधिकारियों के हस्ताक्षर होने की बात कही जा रही है।

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ये हस्ताक्षर असली हैं या फिर कूटरचित, इसका पता लगाने के लिए फॉरेंसिक जांच कराई जाएगी। पुलिस ने जांच के लिए लविवि से पूर्व परीक्षा नियंत्रक, सहायक कुलसचिव और तीन कर्मचारी के सैंपल हस्ताक्षर मांगे हैं। इनके आधार पर फॉरेंसिक विशेषज्ञ अपनी राय देंगे कि फर्जी डिग्री पर दर्ज हस्ताक्षर असली हैं या फिर नकली।

लखनऊ विश्वविद्यालय के फर्जी अंकपत्र पिछले 10 साल से लगातार पकड़ में आ रहे हैं। इसके बावजूद लविवि हर बार बाहर का मामला कहते हुए कभी भी इसे गंभीरता से नहीं ले रहा था। इस बार पुलिस ने फर्जी अंकपत्र तैयार करने वाले गिरोह के पास से फर्जी अंकपत्र के साथ टैबुलेशन चार्ट और डिग्री भी पकड़ी है। इसमें लविवि कर्मचारियों की मिली भगत भी सामने आई है। इसलिए पुलिस अपनी जांच के दायरे में कर्मचारी और अधिकारियों को भी ले रही है।

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शिक्षक की डिग्री जंचवाने के लिए लूटा अध्यक्ष ने लिखा राजभवन को पत्र

लविवि में एक अन्य मामले में लविवि शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. नीरज जैन ने अपने विभाग के एक शिक्षक की डिग्री फर्जी होने की बात कही है। उन्होंने इसकी जांच के लिए वीसी को भी पत्र लिखा था।

डॉ. नीरज जैन के अनुसार, यह मामला कार्य परिषद के सामने नहीं रखा गया। उनके अनुसार विवि प्रशासन इस मामले में जांच की मंशा नहीं दिखा रहा है, इसलिए राजभवन को पत्र लिखकर हस्तक्षेप करने को कहा गया है।
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डिग्री बनवाने के लिए काउंटर पर जमा हुआ आवेदन

फर्जी अंकपत्र जांच मामले की जांच कर रहे अधिकारी अभय सिंह ने बताया कि गिरोह के पास से रवींद्र प्रताप सिंह नाम से एलएलबी की डिग्री मिली थी। इस डिग्री पर रोल नंबर-1567924 पड़ा हुआ है और पास होने का साल वर्ष 2000 है। लविवि के रिकॉर्ड के अनुसार, इस रोल पर कोई डिग्री ही जारी नहीं हुई है। वहीं फर्जी अंकपत्र मामले में आरोपी लिपिक ने स्वीकार किया है कि इस फर्जी डिग्री पर उनकी हैंडराइटिंग है।

उनके अनुसार वर्ष 2010 में इस अंकपत्र के लिए डिग्री बनवाने के लिए काउंटर से आवेदन किया गया था। सत्यापन होने के बाद उनके पास डिग्री आती है। उनका काम केवल उसका लेखन करना था। लिपिक का दावा है कि सत्यापन के बाद उन्हें जो प्रपत्र मिला था, उस पर पूर्व परीक्षा नियंत्रक, सहायक कुलसचिव और दो कर्मचारियों के हस्ताक्षर हैं।

पुलिस ने जब इन लोगों से बात की तो उनका कहना था कि हस्ताक्षर उनके जैसे हैं, लेकिन उनके नहीं हैं। इसलिए पुलिस इस मामले की फॉरेंसिक जांच कराएगी। जांच के लिए उसी समय के कम से कम 10 हस्ताक्षर चाहिए होते हैं। इसलिए कुलसचिव को पत्र लिखकर वर्ष 2010 के आसपास पांच कर्मियों द्वारा विभिन्न प्रपत्रों पर किए गए हस्ताक्षर के मूल रिकॉर्ड मांगे गए हैं। फर्जी डिग्री पर अंकित हस्ताक्षर से इनका मिलान किया जाएगा। इसके बाद सच्चाई सामने आ जाएगी।
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