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लखनवी दस्तरख्वान, जहां स्वाद का बसता है जहान

Sat, 03 Aug 2013 03:56 PM IST
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
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लखनऊ न सिर्फ मेजबानी में अपनी अलग पहचान दर्ज कराता है बल्कि यहां के लज्जतदार दस्तरख्वान भी खासे मशहूर रहे हैं। कहते हैं, नवाब असाफुद्दौला के समय में दाल अशर्फी से छौंकी जाती थी।
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ऐसा इसलिए किया जाता था क्योंकि सोने की भस्म दाल को और स्वादिष्ट और पौष्टिक बना देती थी। इतना ही नहीं लखनऊ के प्रथम बादशाह गाजीउद्दीन हैदर के छह पराठे तीस सेर देसी घी में बनते थे।

बादशाह नसीरूद्दीन हैदर द्वारा रेजीडेंसी के रेजीडेंट को कोठी फरहत बख्स में दी गई दावतों के ठाठ का कोई मुकाबला नहीं।

शीरमाल के क्या कहने
पुलाव में गोश्त की चिड़ियां चावलों पर ऐसे बिठायीं जाती थीं मानो वह सच में हों। लखनवी पुलाव में नूर पुलाव, मोती पुलाव और चमेली पुलाव खासे लज्जतदार माने जाते हैं। इसके अलावा रूमाली रोटी और शीरमाल लखनऊ की खास डिशेज में से हैं।
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योगेश प्रवीण अपनी किताब 'आपका लखनऊ' में लिखते हैं कि दूध और मैदे की बनी बाकरखानी रोटी को यहां के महमूद मियां ने शीरमाल की सूरत दी थी। शीरमाल के साथ कोरमे और कबाब का जायका भी कुछ और हो जाता है।

इस तरह ईरानी कुलचा लखनवी हुआ
थोड़े और पुराने दिनों की बात करें, तो यहां नान अफलातूनी रोटी ईजाद की थी और यहां नान जलेबी भी बनती थी। ईरान और अफगानिस्तान का मशहूर कुलचा भी लखनऊ में आकर एक अलग स्वाद से रूबरू हुआ।

यहां वो तिकोने आकार में मिलता है, जो नहारी के साथ खाया जाता है। लखनऊ की नहारी अपने खास मसालों और गोश्त की बोटियों से बनती है। पाए की नहारी यहां कम पसंद की जाती हैं, यहां के मुगलई अंदाज के खानों में कोरमा और चपाती भी बहुत पसंद किए जाते हैं।

कवाब में पड़ते हैं खास मसाले
कोरमें में अच्छा गोश्त, खास मसाले और घी के तार रहते हैं जिनके साथ बादाम और बालाई का इस्तेमाल होता है जो इसके स्वाद को और दुगुना कर देते हैं। लखनवी कबाब में शामी कवाब, टुंडे कवाब, सीक कवाब और गलावट के कवाब मशहूर हैं।

बात अगर पुलाव बिरयानी और फीरीनी की करें, तो दोनों ही लखनऊ को अपनी पहचान देती हैं। यहां बिरयानी बनाने के लिए चावलों पर घी छिड़ककर गोश्त की तहें लगाई जाती है तब उसको हल्के-हल्के दम दिया जाता है।

बहुत से लोगों को यखनीदार पुलाव के बारे में पता भी नहीं होगा। बताया जाता है कि इसे गोश्त के जूस के साथ चावल मिलाकर बनाया जाता है। शहर के कई बड़े होटल्स में आज भी ये ट्रेडीशनल डिशेज मिल जाती हैं।

ये रहे कुछ खास ठौर
इसके अलावा हजरतगंज में मुशताक की दुकान, नजीराबाद में रहीम की दुकान ये कुछ ऐसे ठौर हैं, जहां लोग आज भी कवाब, बिरयानी और नहारी कुल्चे खाने के लिए पहुंच ही जाते हैं।

वैसे इस नवाबी शहर की मिठाईयां भी मशहूर रही हैं। यहां की बालूशाही, मीने के लड्डू जो खोए और बूंदी से बनते हैं, शकर पारे और नान खटाई का कोई जवाब नहीं है। मलाई की गिलौरी और मलाई मक्खन की बात न हो, यह कैसे हो सकता है। कहते हैं यह लखनऊ की अपनी चीज है।

यहां की बर्फियां भी खास हैं
इतिहासकार योगेश प्रवीण की मानें तो यह मिठाई इतनी नर्म और नाजुक होती है कि नवाबों ने इसे लबे माशूक नाम दिया था। इसके अलावा लखनऊ की बर्फियां भी कहीं और नहीं मिलती हैं। काली गाजर, दूधिया बर्फी, राजभोग, आम की खीर, सोहाल, बैंगनी हरी, सेम के बीच और मठरी प्रसिद्ध है।
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लखनऊ में दही जलेबी भी पसंद की जाती है। सावन में अनरसे की गोलियां भी यहां खाईं जाती हैं।
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