फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

.....और नहीं मिली KGMU को पहली उपलब्धि

Tue, 08 Apr 2014 08:39 AM IST
अमित यादव/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
केजीएमयू में सोमवार को होने वाला पहला किडनी ट्रांसप्लांट अचानक टाल देना पड़ा। दानदाता की सेहत गड़बड़ाने के कारण 105 वर्ष के स्वर्णिम सफर में एक और उपलब्धि जुड़ने से रह गई।
विज्ञापन


इस ट्रांसप्लांट को केजीएमयू के कुलपति प्रो.डी.के.गुप्ता को विदाई के तोहफे के रूप में भी देखा जा रहा था क्योंकि केजीएमयू में आर्गन ट्रांसप्लांट विभाग शुरू करने में उनकी मुख्य भूमिका रही है।

केजीएमयू में आर्गन ट्रांसप्लांट विभाग शुरू करने, कैडबर से एसजीपीजीआई में ट्रांसप्लांट कराने और फिर कैडबर से अंग लेने की अनुमति की बाधाओं को पार करने के बाद गुर्दा प्रत्यारोपण करना ही सबसे बड़ी चुनौती था।
विज्ञापन


इसके लिए तैयारियां भी जोरों पर थी। गुर्दे फेल होने के एक मरीज को उसके पिता ने अपनी किडनी देने के लिए जैसे ही सहमति दी, केजीएमयू में पहले ट्रांसप्लांट की तैयारियां शुरू हो गई थी।

सभी तरह की जांच कराने के बाद मरीज और दानदाता को ट्रांसप्लांट के लिए स्वस्थ पाया गया। शुक्रवार से एक बार फिर अंतिम चरण की जांच प्रक्रिया शुरू की गई थी।

मरीज और दानदाता पिता दोनों ही शताब्दी में भर्ती कर लिए गए थे। सोमवार को अंग लेने से पहले दानदाता का सीटी एंजियो और किडनी का जीएफआर (ग्लोमिरूलर फिल्ट्रेशन रेट ) लिया गया।

बताया जा रहा है कि मानक से कम होने के कारण प्रत्यारोपण टालने का फैसला किया गया। डॉक्टरों का मानना था कि गुर्दा लेने के बाद दानदाता की सेहत भी बिगड़ सकती थी और ट्रांसप्लांट भी पूरी तरह से सफल नहीं होता।

अब मरीज को प्रत्यारोपण के लिए उसकी पत्नी से गुर्दा लेने की सलाह दी गई है। इसलिए एक बार फिर दोनों को लंबी जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।

आर्गन टांसप्लांट विभाग के डॉ. मनमीत ने भी दानदाता के जीएफआर को मानक से कम होने की बात कही है। उन्होंने कहा कि सामान्य जीएफआर 70-80 होना चाहिए। जबकि दानदाता का जीएफआर इससे कम था। इसीलिए  ट्रांसप्लांट को टाल दिया गया है।

केजीएमयू और एसजीपीजीआई के संयुक्त प्रयास से प्रदेश में किडनी-लिवर ट्रांसप्लांट की शुरुआत 13 दिसंबर 2012 को लालता प्रसाद नाम के एक मरीज की ब्रेन डेथ के बाद हुई थी।

लालता के परिवारवालों की अनुमति से उनके दोनों गुुर्दे और लिवर एसजीपीजीआई में भर्ती मरीजों में ट्रांसप्लांट किए गए थे। इसके बाद 5 फरवरी 2014 को हुई अवधेश नाम के मरीज की ब्रेन डेथ के बाद एक और इतिहास रचा गया।

इसमें पहली बार एक ही मरीज को कैडबर से गुर्दा और लिवर लेकर प्रत्यारोपित किया गया था। इन दोनों प्रयासों में केजीएमयू की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

प्रदेश सरकार की अनुमति से केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर को कैडबर घोषित करने की अनुमति मिल गई थी। इसी से प्रदेश में मस्तिष्क मृत व्यक्ति से अंग लेने की प्रक्रिया शुरू हुई थी।
विज्ञापन


इसके बाद जनवरी 2014 में केजीएमयू को कैडबर से अंग निकालने की अनुमति मिली थी। इसके बाद केजीएमयू में ट्रांसप्लांट की सुविधा भी शुरू हो गई।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें