35 ब्लड बैग, जिसमें पांच ट्रिपल बैग सिस्टम के नौ पैकेट (कुल 175 अदद और हर अदद में पांच पीस)। 11 सीपीपी प्लेटलेट बैग, 30 एचाईवी किट, छह मलेरिया किट, नौ एनआईवी किट, चार एचबीएस एजी किट, सात एचसीवी, पांच एचवीएस एजी किट, एक एचसीवी किट, दो मलेरिया एसडी, सात पैकेट ब्लड बैग, 70 सिंगल ब्लड बैग, 14 खुले ब्लड बैग, तीन बोतल नार्मल स्लाइन।
ब्लड ग्रुप के अलावा कोई और जांच नहीं
एसटीएफ के मुताबिक गिरोह के तीन सदस्यों को डोनर का खून निकाल कर उसे ब्लड बैग में डालना आता था। ब्लड बैंकों के दोनों शातिर सिर्फ ब्लड ग्रुप की जांच कर पाते थे। बाकी कोई जांच नहीं होती थी। वे खून में स्लाइन वाटर मिला कर एक यूनिट के दो यूनिट खून बनाते थे। कई बार खून के छोटे बैग में पीआरबीसी ( पैक्ड रेड ब्लड सेल) दर्ज कर उसे बेच देते थे।
रक्तदान करने वाले रक्तदाता की पांच प्रमुख जाचें होती हैं। इसमें एचआईवी, मलेरिया, सिफलिस, हेपेटाइटिस बी और सी की जांच की जाती है। रक्तदाता के ब्लड में इन पांचों में से कोई भी एक बीमारी मिली तो उसका ब्लड किसी दूसरे को नहीं दिया जाता है और उसे नष्ट करा दिया जाता है। साथ ही संबंधित व्यक्ति की पहचान गोपनीय रखी जाती है और उसे बुलाकर इलाज कराने को कहा जाता है।