डॉ विष्णु सक्सेना, डॉ सूर्य प्रसाद दीक्षित
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अमर उजाला के अभियान ‘हिंदी हैं हम’ के तहत आयोजित वेबिनार में विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि हिंदी को रोजगार की भाषा बनाना होगा। देश के प्रतिष्ठित कवि व गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने कहा कि जब तक देश में हिंदी को रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक न तो हिंदी का विकास संभव है और न ही हिंदी को लेकर समस्याओं का अंत ही हो पाएगा।
उन्होंने कहा कि मैं जब अमेरिका समेत अन्य देशों में जाता हूं तो देखता हूं कि वहां पर प्रवासी भारतीय हिंदी को लेकर भारत से कहीं ज्यादा संवेदनशील दिखते हैं। वे अपने बच्चों को हिंदी जरूर सिखाते हैं और अपने घर में हिंदी में ही वार्तालाप करते हैं।
वहां के विश्वविद्यालयों में हिंदी के विभाग खोले गए हैं और हम भारत में हिंदी को सम्मान दिलाने के लिए जूझ रहे हैं। वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी एवं जनसंचार विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि सही अर्थों में जब हिंदी पूरे देश में राजभाषा के रूप में अपनाई जाएगी, तभी इसका विकास संभव है। इसके लिए सभी राज्यों को सर्वसम्मति से निर्णय लेना होगा। बहुत से अहम निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं, हिंदी के मामले में भी ऐसा ही करना होगा।
उन्हें इंग्लिश तो आती है मगर हिंदी नहीं आती...
डॉ विष्णु सक्सेना
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गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने चार पंक्तियों के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा कि ‘बड़े शौक से लेकर लिपिस्टिक लगाते हैं वो, लगानी ठीक से जिनको बिंदी नहीं आती, उन्हें इंग्लिश तो आती है, मगर ठीक से हिंदी नहीं आती’।
डॉ. सक्सेना ने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि स्नातक या परास्नातक स्तर पर हिंदी को लेकर अभियान से पहले हमें प्राइमरी व जूनियर स्तर के स्कूलों से इसके विकास पर ध्यान देना होगा। कहा, मुझे लगता है कि जब बच्चों की नींव मजबूत होगी तो निश्चित तौर पर उनकी आगे की राहें भी सरल हो जाएंगी।
जहां तक हिंदी काव्य मंचों की बात है तो अशुद्ध कविताएं पढ़ने वालों या हिंदी का नुकसान करने वालों की मौजूदगी के लिए काफी हद तक संयोजक भी दोषी होते हैं। जिस वक्त मैं मंचों पर आया, तब हिंदी गीतकारों की संख्या बहुत कम होती थी लेकिन आज स्थितियां बदली हैं और हिंदी मंचों पर चार से पांच गीतकार तक होते हैं। यह बात सही है कि हिंदी के गीतों की स्वीकार्यता मंचों पर बढ़ी है।
डॉ. विष्णु सक्सेना से श्रोताओं ने पूछे प्रश्न
रामायण धर द्विवेदी: सोशल मीडिया पर बहुत सी प्रतिभाएं दिखती हैं लेकिन उस अनुपात में मंचों पर उनकी हिस्सेदारी नहीं दिखती, इसका कारण क्या है ?
उत्तर: मैं मानता हूं कि अगर आपमें प्रतिभा है तो कोई भी व्यक्ति आपको रोक नहीं सकता। आजकल बहुत से नए लिखने वाले ये चाहते हैं कि केवल चार-पांच कविताएं लिखकर ही उन्हें बड़ें मंचों पर वाहवाही मिलने लगे। सफलता का कोई जुगाड़ वाला तरीका नहीं होता। सफलता के लिए तपना तो पड़ता ही है। प्रतिभा अपना स्थान एक न एक दिन जरूर बना लेती है।
राष्ट्र भाषा बने हिंदी, पाठ्यक्रम में भी हो बदलाव
डॉ सूर्य प्रसाद दीक्षित
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लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी एवं जनसंचार विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि लोग भाषा और बोली में अंतर नहीं समझ पाते हैं। कुछ लोग हिंदी का विरोध करते हुए कहते हैं कि उनकी मातृभाषा तो भोजपुरी, अवधी या ब्रज है।
उन्होंने कहा कि हिंदी को उचित मान दिलाने के लिए ये जरूरी है कि उसे राष्ट्र भाषा बनाया जाए। साथ ही स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के स्तर पर पाठ्यक्रम में बदलाव हों। हिंदी के मानकीकरण की भी जरूरत है जिसके तहत उच्चारण व वर्तनी को लेकर अभ्यास को महत्व दिया जाए।
सरकार द्वारा चलाया जा रहा कौशल विकास कार्यक्रम हिंदी को रोजगार से जोड़ने की ओर एक कदम है जिसे विकसित किया जाए। शिक्षण पद्धति का भी पुनर्गठन किया जाए। राजभाषा आयोग से लेकर अन्य प्रमुख जगहों पर हिंदी सेवियों की भर्ती हो और वहां की बागडोर हिंदी विशेषज्ञों को दी जाए।
नई शिक्षा नीति से कुछ सुधार की संभावना
डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति से सुधार की संभावना नजर आ रही है जिसे कुछ संशोधन के साथ भली-भांति लागू करने की जरूरत है।
श्रोताओं ने पूछे प्रश्न
अमित हर्ष: मौजूदा दौर में अंग्रेजी, उर्दू और अन्य भारतीय भाषाएं व बोलियां हिंदी की प्रतिद्वंद्वी हैं या सहयोगी ?
उत्तर: जिसे हम हिंदी कहते हैं, वास्तव में उसमें करीब 17 भाषाओं का मेल है। जहां तक उर्दू का सवाल है तो यह कहीं बाहर देश से नहीं आई है, बल्कि इसकी उत्पत्ति पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही हुई है। हम जो भाषा बोलते हैं वो हिंदुस्तानी है और जो सरकारी कामकाज में इस्तेमाल होती है वो राजभाषा है। अंग्रेजी के करीब 750 शब्दों का हिंदीकरण कर लिया गया है। इसी तरह से विदेशियों ने भी हिंदी के कई शब्द अपनाकर उसे हिंग्लिश का नाम दिया है। कोई किसी की प्रतिद्वंद्वी भाषा नहीं है। हमें दूसरी भाषाओं के सरल शब्दों को अपनाना चाहिए। आज लखनऊ में आधे से ज्यादा शब्द उर्दू के बोले जाते हैं जिन्हें हमने हिंदी के तौर पर अपना लिया है।
370 की तरह राजभाषा अनुच्छेदों की हो समीक्षा
डॉ राहुल अवस्थी
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कवि व अकादमिक विश्लेषक डॉ. राहुल अवस्थी कहते हैं कि राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान में जब सजा का प्रावधान है तो भाषा के लिए दंड विधान की व्यवस्था क्यों नहीं है। चुनौतियों से निपटने के लिए भाषा की आधारभूत संरचना से लेकर उच्च शिक्षा तक काम ही काम बाकी है।
भाषा को प्रारंभ से ही प्रयोजनमूलक बनाइए, प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा मौलिक अधिकार और अनिवार्य हो। हिंदी को लेकर हेयता की मानसिकता को समाप्त करना होगा। विभागों और मंत्रालयों के परामर्शकों की निष्ठा और प्रतिभा पर नजर रखनी होगी।
पाठ्यक्रम और पुरस्कार समितियों की परीक्षा और पुनर्रचना करनी होगी। अप्रासंगिक पाठ्यक्रम को हटाकर उसे प्रयोजनपूर्ण और प्रासंगिक करना होगा। सांविधानिक तौर पर राजभाषा अध्याय की समीक्षा हो और उनके नकारात्मक अनुच्छेदों के साथ भी 370 की तरह व्यवहार हो। परिवर्तन त्वरित रूप से जगमगा उठेगा। भाषा आयोग व्यावहारिक स्तर पर सक्रिय हो। एपीआई का पेट भरने के लिए आयोजित होने वाली व्यवस्थाएं बंद हों।
डॉ. राहुल अवस्थी से पूछे गए प्रश्न
दुर्गेश शुक्ल ‘दुर्ग’ व शालिनी पांडेय ‘सरल’: हिंदी सभी राज्यों की शिक्षा में अनिवार्य विषय क्यों नहीं हो सकता? अधिकतर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में नो हिंदी जोन बने हैं। ऐसी स्थिति में हिंदी का विकास कैसे होगा?
उत्तर : मुश्किल यह है कि हमारे यहां आत्मशक्ति व ईमानदारी की कमी है। इसके लिए हिंदीजीवी को हिंदीनिष्ठ होना होगा। हिंदी विरोध या राष्ट्र विरोध कहीं बाहर से नहीं आ रहा, यह हमारे देश में ही उपजता है। जहां कहीं भी ऐसा होता देखें तो पूरी इच्छाशक्ति से अपना विरोध जताएं।
विद्यालयों में हो शिक्षकों की भर्ती
डॉ अशोक अज्ञानी
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वरिष्ठ कवि और प्रधानाचार्य डॉ. अशोक अज्ञानी ने कहा कि इस बार उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं में आठ लाख बच्चे अनुत्तीर्ण हो गए जो बहुत दुखद स्थिति है। मेरा अनुभव रहा है कि जिन बच्चों का आधार ज्ञान, प्राथमिक और जूनियर स्तर कमजोर होता है, उन्हें माध्यमिक में अपेक्षाकृत मेधावी बना पाना कठिन है।
उसके लिए उपचारात्मक शिक्षण, सत्र के प्रारंभ में ही होना चाहिए। सभी विद्यालयों में हिंदी शिक्षक की नियुक्ति अनिवार्य रूप से होनी चाहिए । तीसरी बात हिंदी को आसान समझने की बजाय उस पर भी उतनी मेहनत करनी चाहिए, जितनी विज्ञान या गणित पर करते हैं। इसके विपरीत व्यक्तिगत परीक्षार्थी स्वतंत्र होते हैं और कम श्रम करने वाले अधिक अनुत्तीर्ण होते हैं।
श्रोताओं ने पूछे प्रश्न
आकर्ष पटेल, गिरिधर राय, मित्र विपुल व मनीष मगन: बड़े पदों पर बैठे लोग या धनवान व राजनेता अपने बच्चों को हिंदी माध्यम के स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहते और उन्हें बच्चों को अंग्रेजी में बात करने को प्रेरित किया जाता है?
उत्तर: यह उन अभिभावकों का भ्रम है कि अंग्रेजी माध्यम में ही पढ़कर प्रगति की जा सकती है जबकि हिंदी माध्यम में भी अच्छी सुविधाएं हैं जहां से पढ़कर लोग उच्च पदों पर चयनित होकर गर्व से देश की सेवा कर रहे हैं।
चुनौतियां तो हैं, पर समाधान की ओर भी बढ़ रहे हैं हम
डॉ अमिता दुबे
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उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की संपादक डॉ. अमिता दुबे बताती हैं कि 30 वर्षीय कार्यानुभव में मुझे लगता है कि साहित्य सृजन के क्षेत्र में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है। इसका एक कारण आधुनिक संचार के माध्यमों के साथ हमारी संलिप्तता भी है। इन माध्यमों ने हमारी अभिव्यक्ति का फलक विस्तृत किया है।
साहित्य सृजन के क्षेत्र में साहित्य के विद्यार्थियों के साथ डॉक्टर, इंजीनियर व अन्य प्रकार की तकनीकी पढ़ाई करने वाले युवाओं ने सार्थक दस्तक दी है। ये शुभ लक्षण हैं, क्योंकि इससे हिंदी की जनग्राह्यता में वृद्धि हुई है। उन्होेंने कहा कि हमें भाषा की शुद्धता पर ध्यान देना है।
आज रचनाकार, सोशल मीडिया पर लाइक के भ्रमजाल में उलझकर अधीर हो जाते हैं जो उनके लेखन को प्रभावित करता है। इससे बचने की आवश्यकता है। हमारे सामने चुनौतियां तो हैं परंतु हम सार्थक समाधान की ओर निरंतर बढ़ रहे हैं।
प्राथमिक स्तर पर शिक्षा में सुधार की जरूरत
वत्सला पांडेय
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शिक्षिका व कवयित्री वत्सला पांडेय ने कहा कि हमारे पास शिक्षा ग्रहण करने समाज का वो वर्ग आता है जिसके अभिभावक निम्न आय वर्ग के होते हैं। झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले वर्ग के बच्चे मात्र 6 घंटे हमारे संपर्क में रहते हैं बाकी आसपास का वातावरण उन पर हावी रहता है।
ऐसे में उनकी भाषा भी दूषित हो जाती है जिसको सुधारने के लिए हम शिक्षिकाएं श्यामपट के एक हिस्से में सही और गलत शब्द लिखकर बच्चों द्वारा बोले जाने वाले गलत शब्दों को सुधरवाते हैं। हिंदी को यदि हम प्राथमिक स्तर से ही सहज व सरल बनाएंगे तो आगे की कक्षाओं में दिक्कत नहीं होगी। बुनियाद मजबूत होगी तभी इमारत सुंदर होगी।
हिंदी के लिए अच्छी मानसिकता जरूरी
डॉ वीएन तिवारी
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सीडीआरआई के पूर्व वरिष्ठ हिंदी अधिकारी डॉ. वीएन तिवारी ने बताया कि सरकारी कामकाज में हिंदी के कार्यान्वयन की जो स्थिति है, उस कार्यालय के प्रमुख की मानसिकता पर निर्भर करती है। अगर कार्यालय प्रमुख हिंदी के प्रति थोड़ा प्रेम रखते हैं और राजभाषा नीति अधिनियम और नियमों के अनुपालन का महत्व समझते हैं तो वहां कार्यान्वयन की स्थिति बहुत अच्छी है।
लेकिन जहां ब्यूरोक्रेसी में अंग्रेजी दा मानसिकता वाले अधिकारी हैं वहां हिंदी कार्यान्वयन की स्थिति अच्छी नहीं है। आज की तारीख में हिंदी कार्यान्वयन के लिए कोई समस्या नहीं है। हां, मानसिकता जरूर महत्वपूर्ण कारण है जो एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है। इस पर जरूर चिंतन की आवश्यकता है। एक श्रोता ने जो प्रश्न उठाया है की नौकरियों में हिंदी सकारात्मक भूमिका में नहीं है।
सुधांशु व प्रियांशु वात्सल्य, मृत्युंजय व सोमनाथ कश्यप: सरकारी विभागों में हिंदी को इतना उपेक्षित क्यों रखा जाता है?
उत्तर: मैं इस बात से आंशिक रूप से सहमत हूं क्योंकि हिंदी अभी रोजगार परक भाषा के रूप में अपने को प्रतिष्ठित नहीं कर पाई है। लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी है कि यूपीएससी या अन्य किसी केंद्र सरकार के किसी भी विभाग की प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी माध्यम से लिखित परीक्षा और साक्षात्कार देने का विकल्प तो है ही, रही बात अंग्रेजी के अनिवार्य प्रश्न पत्र की तो उसका स्तर बहुत अधिक नहीं होता है।