टीबी होने पर बार-बार गांठ निकले तो घबराएं नहीं
एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी में होती है ऐसी समस्या, इलाज से खत्म हो जाती है बीमारी
केजीएमयू के डॉॅक्टरों ने किया शोध, यूरोपियन रेस्पिरेटरी सोसायटी के जर्नल में हुई प्रकाशित
चंद्रभान यादव
टीबी होने पर शरीर में गांठ निकलने के बाद जब इलाज शुरू होता है तो और भी गांठें निकलने लगती हैं। यह देख मरीज घबरा जाते हैं, लेकिन दवा चलती रहने से दिक्कतें दूर हो जाती हैं। करीब 75 फीसदी से अधिक मरीज बिना इलाज बदले ठीक हो जाते हैं। यह बात ‘इम्यून रीकॉन्स्टीट्यूशन इन्फ्लैमेटरी सिंड्रोम’ पर की गई शोध में सामने आई। यह शोध केजीएमयू रेस्पेरेटरी मेडिसिन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. दर्शन बजाज और उनकी टीम ने किया।
शोध में शामिल ज्यादातर मरीज गले की गांठ, फेफड़े की टीबी से संबंधित थे। विभिन्न जिलों से दहशत में आए इन मरीजों के इलाज में किसी तरह का परिवर्तन नहीं किया गया। फिर भी 75 फीसदी ठीक हो गए। जिन मरीजों के फेफड़े या पेट में पानी भर गया था, उनकी पानी निकाली गई। जो गंभीर स्थिति में थे, उन्हें भर्ती करने नियमित तौर पर दवाएं, पोषक तत्व दिए गए। धीरे-धीरे यह मरीज ठीक हो गए। इस शोध को यूरोपियन रेस्पेरेटेरी सोसायटी के जर्नल में प्रकाशित किया गया है। डॉ. दर्शन बजाज के इस शोध में विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यकांत, ज्योति बाजपेयी भी शामिल थे।
क्यों पड़ी जरूरत : डॉ. दर्शन बजाज ने बताया कि एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी के मरीजों में इलाज के दौरान कई गांठें निकल आने से कुछ चिकित्सक भी कंफ्यूज हो रहे थे। मरीजों में अजीब सी दहशत थी। उन्हें लग रहा था कि उनका इलाज गलत दिशा में जा रहा है और टीबी पूरे शरीर में फैल रही है।
इलाज के दौरान लक्षण बढ़ना सामान्य
डॉ. दर्शन बजाज ने बताया कि एक्सट्रा पल्मोनरी टीबी में इलाज शुरू होने के दो से तीन माह के अंदर लक्षण बढ़ना सामान्य घटना है। बस दवाएं नियमित लें। खानपान में पौष्टिक और प्रोटीन वाली चीजें बढ़ा दें।
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इलाज के बाद खत्म हो गई टीबी
केस 1
अंबेडकरनगर निवासी 20 साल के युवक के गले में गांठ थी। जांच में टीबी निकला। इलाज अंबेडकरनगर में ही शुरू हो गया। इलाज के कुछ दिन बाद दो और गांठें निकर्ल आइं। इस पर डॉक्टर ने केजीएमयू रेफर कर दिया। केजीएमयू में इलाज में कोई बदलाव नहीं किया गया। जो दवाएं पहले चल रही थीं, उन्हीं दवाओं से करीब 13 माह बाद गांठ खत्म हो गईं। दोबारा जांच कराई गई तो टीबी खत्म हो गई थी।
केस 2
बहराइच के प्रेमशंकर (45) के बाएं फेफड़े में पानी भर गया था। जांच में टीबी की पुष्टि हुई। दवाएं शुरू हुईं, लेकिन ढाई माह बाद दाएं फेफड़े में भी पानी भर गया। परिवारीजन उसे लेकर केजीएमयू पहुंचे। यहां सप्ताहभर भर्ती करने के बाद छुट्टी दे दी गई, लेकिन परिवार घर ले जाने को तैयार नहीं हुआ। इस बीच पहले वाली ही दवाएं चलाई गईं। सिर्फ 14 दिन तक स्टेरॉयड दिया गया। इसके बाद परिवार को घर ले गया। अब मरीज स्वस्थ है। ड्यूटी भी कर रहा है।
जानिए, क्या होता है एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी
फेफड़े की टीबी को पल्मोनरी और शरीर के अन्य हिस्से की टीबी को एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी कहते हैं। टीबी के मरीजों में करीब 70 फीसदी में पल्मोनरी और करीब 30 फीसदी में एक्स्ट्रा पल्मोनरी होती है। एक्स्ट्रा पल्मोनरी के मरीजों से दूसरों को संक्रमण का खतरा नहीं होता है। इस बीमारी की वजह रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी बताई जाती है। यह जिस अंग में होती है, वहां सूजन या दर्द, हल्का बुखार, रात में पसीना आता है, भूख नहीं लगती है। अगर एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी फेफड़े में हो जाए तो वहां भी पानी भर जाता है। यह जिस अंग में होती है वहां गांठ बन जाती है। गांठ से पानी निकाल कर जांच की जाती है या संबंधित अंग की सीटी स्कैन कराया जाता है। इसका इलाज सामान्य स्थिति में नौ से 12 माह और गंभीर स्थिति में करीब 24 माह चलता है। सभी जांचें सरकारी अस्पताल में मुफ्त होती हैं।