दिल्ली में आम जनता ने ‘आप’ की सरकार चुनकर अपनी ताकत दिखा दी है। उसने संदेश भी दिया है कि जनता चाहे तो कोई भी परिवर्तन ला सकती है। देश की राजधानी में सरकार के गठन के साथ ही आम जनता की मूलभूत समस्याओं को दूर करने की बात शुरू हो गई है।
दिल्ली की तुलना में लखनऊ को देखें तो यहां की समस्याएं भी वहां से जुदा नहीं हैं। यहां भी लोग बिजली, पानी, सड़क, स्कूल में डोनेशन, अपराध, अवैध बस्तियों और अवैध कॉलोनियों में सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दों से जूझ रहे हैं।
आखिर कब दूर होंगी ये समस्याएं? यहां कब बनेगी आपकी सरकार? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशती और समस्याओं से रूबरू कराती ‘अमर उजाला’ की रिपोर्ट
सिर्फ आधा ही मिल रहा पानी
दशकों के इंतजार के बाद शहर को तीसरा जलकल तो दो साल पहले मिल गया और ऐशबाग स्थित बालागंज जलकल भी उच्चीकृत हो गया मगर शहर अब भी प्यासा है।
दिल्ली में केजरीवाल ने हर व्यक्ति को 700 लीटर पानी मुफ्त देने का वादा किया है। हमारे यहां प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी पर्याप्त माना गया है, लेकिन उपलब्धता सिर्फ 60 से 70 लीटर ही है।
यह हाल तो उन इलाकों का है, जहां पर पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था है। शहर की सीमा से सटे चिनहट, कन्हैया माधवपुर, दुबग्गा, आईआईएम रोड, गोमती नगर विस्तार योजना में शामिल गांवों में तो अब तक पेयजल लाइनें ही नहीं पड़ी हैं।
केकेसी, मवैया, चारबाग और पुराने लखनऊ के कई ऐसे इलाके हैं, जहां पेयजल की समस्या वर्षों बाद भी जस की तस है। वैसे जलकल महाप्रबंधक का कहना है कि पेयजल आपूर्ति काफी सुदृढ़ हुई है। जहां समस्या है उसे दूर किया जा रहा है।
हर साल करोड़ों खर्च, फिर भी सड़कें बदहाल
सड़कों की मरम्मत के नाम पर नगर निगम हर वित्तीय वर्ष में करीब सौ करोड़ रुपये खर्च करता है। यही हाल लोक निर्माण, विकास प्राधिकरण, आवास विकास परिषद व अन्य सरकारी महकमों का भी है, लेकिन सड़कें फिर भी खस्ताहाल हैं।
इन पर चलना जोखिम भरा काम है। कब गाड़ी स्लिप हो जाए या सड़क पर हर दो कदम पर मौजूद छोटे-बड़े गड्ढे में पहिया पड़ने से कब गिर जाएं पता नहीं। शहर की कुछ प्रमुख सड़कें भले ही आपको चमचमाती दिख जाएं मगर कालोनियों, मोहल्लों की सड़काें की ऐसी किस्मत नहीं है।
अलीगंज सेक्टर की मेन रोड, नॉवेल्टी सिनेमा अलीगंज, पिकनिक स्पॉट रोड इंदिरानगर आदि सड़कें पिछले कई साल से बदहाल हैं। बड़े-बड़े गड्ढे हैं। इस सड़क पर रहने वाले भी परेशान हैं और इससे गुजरने वाले भी।
राजाजीपुरम, विकास नगर, डालीगंज, आलमबाग व पुराने शहर के तमाम इलाकों में सड़कों का यही हाल है। ऐसे ही सड़कों की मरम्मत के लिए अब लोक सभा चुनाव से पहले सरकार 100 करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है, ताकि लोगों का गुस्सा कम किया जा सके।
कौन मिटाएगा अवैध कॉलोनी का दाग
शहर में 241 कॉलोनियां ऐसी हैं, जिन्हें एलडीए ने अवैध घोषित कर रखा है। दशकाें पहले बसी इन कॉलोनियों को बसाने वालों का पता नहीं और अब यहां के निवासी विकास कार्यों के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं।
इनकी बात न तो एलडीए के अधिकारी सुनते हैं और न ही नगर निगम के। नगर निगम सदन में गोमती नगर व जानकीपुरम वार्ड के पार्षद यह मसला कई बार उठा चुके हैं।
जिसके बाद तत्कालिक तौर पर तो वहां पर नगर निगम की ओर से कुछ कार्य कराए गए, लेकिन इससे कॉलोनी की समस्याओं का निपटारा नहीं हो पा रहा है।
हरदोई रोड, कानपुर रोड, जानकीपुरम, सीतापुर रोड और पारा के आसपास ऐसी कई कालोनियां हैं, जहां लोग सस्ते के चक्कर में प्रॉपर्टी डीलर के झांसे में फंस गए और अब जनसमस्याओं से जूझ रहे हैं।
प्रॉपर्टी डीलर आम आदमी को झांसा न दे सके, इसकी जिम्मेदारी एलडीए की है मगर वह तब तक आंखे बंद किए रहता है जब तक प्रॉपर्टी डीलर प्लाटिंग करने के बाद गायब नहीं हो जाते।
मलिन बस्तियां : वोट बैंक से अधिक नहीं
शहर में करीब 600 मलिन बस्तियां हैं, जिनमें हजारों लोग रहते हैं। यह बस्तियां खाली पड़ी सरकारी जमीनों के अलावा शहर के प्रमुख नालों (हैदर कैनाल, कुकरैल, पाटा नाला आदि) और गोमती तट पर बसी हैं।
इनमें जनसुविधाओं की स्थिति दोयम दर्जे की है। यहां पर न तो सीवर का इंतजाम है और न पीने के पानी का। हैरानी की बात तो यह है कि सरकारी लापरवाही के कारण इनकी संख्या घटने के बजाए बढ़ रही है।
नेताओं के लिए यह इन बस्तियों में रहने वाले वोट बैंक से अधिक नहीं हैं। हर बार चुनाव में इनकेउत्थान की बात उठती है मगर शहर में अभी एक भी मलिन बस्ती का पूरी तरह से उद्घार नहीं हो सका है।
एक अदद छत के लिए तरस रहे लोग
गरीब जरूरतमंदों को आवास उपलब्ध कराने के लिए शहर में अभी कोई सरकारी योजना नहीं चल रही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि करीब तीन महीने पहले शुरू हुई ‘आसरा’ योजना में कुल 780 मकानों के लिए 70000 लोगों ने पंजीकरण कराया है।
पंजीकरण कराने के लिए लोगों ने सुबह से शाम तक लाइन लगाई और लाठियां भी खाईं। डूडा के परियोजना प्रबंधक का कहना है कि यह योजना छह हजार रुपये मासिक आमदनी वालों के लिए थी। मलिन बस्तियों के लिए केंद्रीय राजीव आवास योजना शुरू होने वाली है।
बिजली : बिल बढ़ा, सप्लाई नहीं
पावर कॉर्पोरेशन ने अपने घाटे को दूर करने के लिए जून में बिजली रेट बढ़ा दिए, लेकिन बिजली आपूर्ति में कोई सुधार नहीं हुआ। 10 जून से प्रभावी बिजली के नये रेट से राजधानी के 6.91 लाख उपभोक्ता प्रभावित हुए।
कॉर्पोरेशन ने अपने फायदे के लिए खपत रीडिंग यूनिट के कई नए स्लैब बना दिए। पहले तो घरेलू बिजली का न्यूनतम रेट तीन रुपये से बढ़ाकर 3.45 रुपये प्रति यूनिट कर दिया, वहीं 500 यूनिट का रेट सीधे पांच रुपये यूनिट कर दिया गया। घरेलू फिक्स चार्ज 65 रुपये से बढ़ाकर 75 रुपये कर दिया।
इसके कारण उपभोक्ता पर रेट महंगे होने की दोतरफा मार पड़ी। इसी प्रकार कॉमर्शियल से लेकर उद्योग तक की बिजली को महंगा किया गया। बिजली तो महंगी हो गई पर आपूर्ति में कोई सुधार नहीं हुआ।
निजी स्कूल : डोनेशन से पढ़ाई
सरकारी स्कूलों में शिक्षा के खराब को स्तर को देखते हुए अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाने को मजबूर हैं। निजी स्कूल हर कदम पर अभिभावकों का शोषण करते हैं।
एडमिशन के लिए डोनेशन और उसके बाद महंगी फीस जमा करके बच्चों को दाखिला मिलता है। अपने स्टैंडर्ड के हिसाब से स्कूल छोटी क्लास में ही पांच हजार रुपये महीने तक फीस वसूलते हैं।
बड़ी कक्षाओं में फीस की रकम सात-आठ हजार रुपये मासिक तक पहुंच जाती है। इसी तरह निर्धारित दुकान से मनमाने दाम पर स्कूल ड्रेस और कॉपी-किताब खरीदने की अनिवार्यता अलग से होती है।
अगर विद्यालय की बस से स्कूल आए तो उसकी वसूली के लिए भी अभिभावकों को तैयार रहना पड़ता है। स्कूलों की मनमानी यहीं तक सीमित नहीं रहती। विकास अनुदान, फाइन, फंक्शन फीस आदि मदों में हर महीने अभिभावकों की जेब ढीली की जाती है।
सरकारी विभाग : भ्रष्टाचार की संगठित नेटवर्किंग
सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। आम आदमी को अपना काम कराने के लिए टॉप टू बॉटम तक काम कर रहे नेटवर्क के सिस्टम में आना पड़ता है।
संगठित रूप से काम करने वाले हाईप्रोफाइल इसे लाइजनिंग का नाम देते हैं। ऐसा नहीं कि भ्रष्टाचार की यह बदरंग तस्वीर दिखाई नहीं देती पर विडंबना यह है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो आखिर समाज का क्या होगा। कुछ ऐसा ही माहौल सरकारी महकमों में है।
अनियमितताओं पर कार्रवाई करने वाले ही अनियमितता करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। हालत यह है कि जिला प्रशासन के अधीन विभागों में आम आदमी से घूसखोरी का सिलसिला बंद करने के लिए लागू की गई ऑनलाइन प्रणाली में भी वसूली की जुगत बना ली गई है।
मसलन आमजन के लिए निवास, आय, जाति प्रमाणपत्र बनवाने के लिए तहसीलों में महीनों दौड़ लगानी पड़ती थी। ऑनलाइन प्रणाली में भुक्तभोगियों की मानें तो हर टेबल पर महीनों चक्कर लगाने की बजाय एकमुश्त फीस अदाकर प्रमाणपत्र बन जाता है।
महकमों से जुड़े कामों को करने वाले लोग अपने कार्य में अड़ंगा न लगे, इसके लिए हर पटल पर एक रिश्ता डवलप कर लेते हैं। इस रिश्ते में एक बात बहुत साफ होती है कि आप हमें क्या लाभ देंगे, बदले में हमसे क्या लेंगे।
उदाहरण के तौर पर शहरों में मनोरंजन विभाग में पंजीकृत डिश केबल टीवी चलाने वालों को मनोरंजन कर जमा करना होता है। सब्सक्राइबर ज्यादा दर्शाया कम, जो लाभ हुआ वह आधा-आधा।
स्वास्थ्य : गरीब के लिए आसान नहीं गंभीर बीमारी का इलाज
राजधानी में पीजीआई, लोहिया संस्थान से लेकर केजीएमयू समेत कई बड़े अस्पताल हैं, लेकिन इलाज के लिए मरीजों को दर-दर की ठोकरे खानी पड़ती हैं। आधुनिक सुविधाओं का लाभ पढ़े-लिखे और संपन्न लोगों को ही मिल पाता है।
सामान्य और गरीब जनता को बेहतर इलाज मिलना मुश्किल हो गया है। सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों को सुपर स्पेशियलिटी चिकित्सा सुविधा देने के लिए भवनों का निर्माण हुआ, लेकिन उन्हें आधुनिक बनाने वाले उपकरण आज तक वहां नहीं पहुंचे।
करोड़ों रुपये खर्च कर भवन बने, लेकिन हर साल की तरह दिमागी बुखार और डेंगू ने कई लोगों की जान ले ली। कैंसर और हेड इंजरी के मरीजों को इलाज मिलना तो लखनऊ में मुश्किल है।